भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्वका प्रतिपादन * ४२१


परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयी हैं—वे सुख-दुःखनामक द्वन्द्वोंसे विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं।
( सर्ग ५३ )

श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्व-रहस्यका प्रतिपादन

श्रीभगवान्‌ने कहा—महाबाहो अर्जुन ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुनो, जिसे मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहूँगा। कुन्तीपुत्र ! सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं; इसलिये भारत ! उनको तुम सहन करो। इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंका विषय-संसर्ग, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व या इनसे भिन्न जो कुछ भी पदार्थ हैं, वे सब-के-सब एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे तनिक भी पृथक् नहीं हैं अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही है। अतः फिर, सुख और दुःख कहाँ ? आदि-अन्तसे रहित तथा अवयवहीन परमात्मामें पूर्णता और अपूर्णता कैसे हो सकती है । इसलिये जो पुरुष सुख-दुःखमें समान और धीर है, वह अमृतमय ब्रह्मपदको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। वास्तवमें सभी तरहसे सुख-दुःखोंका अस्तित्व तनिक भी नहीं है। परमात्मतत्त्व ही सर्वरूप है, इसलिये अनात्मारूप संसारकी सत्ता कैसे स्थिर होगी। क्योंकि असत् वस्तुकी तो सत्ता है नहीं और सत्‌का अभाव नहीं है अतएव सुख-दुःख आदि हैं ही नहीं, केवल एक सर्वव्यापी परमात्मा ही है। अर्जुन ! यद्यपि आत्मा दृश्य पदार्थोंका साक्षीरूपसे साक्षात्कार करनेवाला चेतनस्वरूप है और शरीरके अंदर रहता भी है, तथापि वह सुखोंसे न तो हर्षित होता है और न दुःखोंसे दुखित ही । परमात्मासे पृथक् देह आदि कुछ भी नहीं है और न दुःख आदि ही हैं; अतः वास्तवमें कौन किसका अनुभव करेगा ? क्योंकि एक परमात्माके सिवा दूसरी वस्तु है ही नहीं। भारत ! यह दुःख अज्ञानसे उत्पन्न एक प्रकारकी भ्रान्ति ही है

अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। जिस प्रकार रज्जुका यथार्थ तत्त्व न जाननेसे उत्पन्न हुआ रज्जुमें सर्पका भय रज्जुके यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानसे उत्पन्न हुए देह एवं दुःखादिका अस्तित्व परमात्माके तात्त्विक ज्ञानसे नष्ट हो जाता है। यह विश्व नित्य एवं पूर्ण ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है, इसे ही ध्रुव सत्य जानो। यही यथार्थ बोध है।

अर्जुन ! तुम मान, मद, शोक, भय, इच्छा, सुख, दुःख—इस सम्पूर्ण असद्रूप जड द्वैत-प्रपञ्चसे रहित हो जाओ और एकमात्र अद्वितीय चिन्मय सत्यरूप परमात्मामें तद्रूप हो जाओ। भारत ! सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजयके ज्ञानसे रहित होकर तुम एकमात्र शुद्ध ब्रह्मरूप हो जाओ; क्योंकि तुम ब्रह्मरूप ही हो। अर्जुन ! तुम जो कर्म करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और भविष्यमें जो कुछ शास्त्रानुकूल अनुष्ठान करोगे, वह सब परमात्म-रूप ही है—इस प्रकारके ज्ञानमें स्थिर रहो। जो पुरुष अपने अन्तःकरणमें जिस पदार्थका संकल्प करता है, वह निस्संदेह उसी रूपमें बदल जाता है। इसलिये अर्जुन ! सत्यस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त करनेके लिये तुम सत्यस्वरूप ब्रह्म हो जाओ । क्योंकि जो पुरुष विनाशशील क्रियारूप संसारमें अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्मको स्थित देखता और अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्ममें विनाशशील क्रियारूप संसारको कल्पित देखता है, वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् है और सम्पूर्ण कर्मोंको कर चुका है—ऐसा कहा गया है—इसलिये अर्जुन ! तुम कर्मोंमें वासना तथा कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हो