संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 466, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति आत्माकी अविनाशिता आदिका प्रतिपादन * ४२३
अज्ञानी मनुष्य ही आत्मामें आत्माको अनात्मरूपसे देखते हैं यानी देहको ही आत्मा मानते हैं। तथा यह नष्ट हो गया और यह प्राप्त हो गया—इत्यादि भावनाएँ वन्ध्या स्त्रीके पुत्रके समान मोहजनित भ्रम (असत्) हैं। असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है। नाशरहित तो तुम उसको जानो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्—दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये भरतवंशी अर्जुन ! तुम युद्ध करो। आत्मा एक है और द्वैत है ही नहीं; अतः आत्माके सिवा दूसरे असत् पदार्थकी उत्पत्ति हो कैसे सकती है ? क्योंकि सत्का नाश नहीं होता, इसलिये यह सद्रूप परमात्मा अविनाशी और अनन्त है।
अर्जुनने पूछा—भगवन् ! तब तो 'मैं मर गया हूँ' इस प्रकार मनुष्योंकी मरणस्थिति किस हेतुसे प्राप्त होती है और उस स्थितिमें प्रभो ! लोगोंको प्रसिद्ध स्वर्ग और नरक कैसे प्राप्त होते हैं !
श्रीभगवान्ने कहा—अर्जुन ! पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन और बुद्धि—इनसे युक्त तन्मात्राओंका जो समूह है, अज्ञानसे तत्स्वरूप हुआ ही जीव देहोंमें स्थित रहता है। वह देहमें स्थित जीवात्मा वासनासे उसी तरह खींचा जाता है, जिस तरह रस्सीसे बछड़ा। वह शरीरके अंदर पिंजरेमें पक्षीकी तरह बैठा रहता है। जब देश और कालसे जर्जर हुए शरीरसे यह जीव वासना लेकर निकल जाता है, तब इसीको लोग मरना कहते हैं। जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचाको तथा रसना और घ्राणको ग्रहण करके पूर्व शरीरसे दूसरे शरीरमें चला जाता है। इसका शरीर वासनामय ही है यानी केवल वासनाके अनुसार ही उत्पन्न हुआ है, अन्य किसी दूसरे कारणसे नहीं। अतएव वासनाका त्याग होनेपर लिङ्गदेह विनष्ट हो जाता है और उस लिङ्गदेहके विनष्ट हो जानेपर वह जीवात्मा परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह वासनामय जीव वासनासे परिपुष्ट होकर अज्ञानसे अनेक भ्रमोंका भार ढोता हुआ कर्मानुसार नाना योनियोंमें भ्रमण करता है; यही जीवात्माका जन्म-मरण है। कुन्तीपुत्र अर्जुन ! शरीरसे जीवके निकल जानेपर देह इसी प्रकार कम्पनशून्य हो जाती है, जिस प्रकार वायुके शान्त हो जानेपर वृक्ष। जब शरीर जीवात्मासे रहित हो जाता है, तब वह 'मर गया' यों कहा जाता है। अनादि अविद्यासे मूढ़बुद्धि यह जीव अपने कर्म और वासनाके अनुसार नरक, स्वर्ग, (इसी लोकमें) पुनर्जन्म आदि, जिनमें भ्रमण करनेका उसने चिरकालसे अभ्यास किया है, अनुभव करता रहता है।
अर्जुनने पूछा—जगत्पते ! इस जीवका स्वर्ग, नरक, मर्त्यलोक आदिमें जो भ्रमण होता है, उसमें कारण क्या है, यह आप मुझसे कहिये।
श्रीभगवान् बोले—अर्जुन ! चिरकालिक अभ्याससे प्रौढ हुई स्वप्नतुल्य यह वासना ही जीवको संसाररूप भूलभुलैयामें डालती है; इसलिये तत्त्वज्ञानके अभ्याससे वासनाका समूल क्षय ही जीवके लिये कल्याणकारक है।
अर्जुनने पूछा—देवदेवेश ! यह वासना किससे उत्पन्न हुई और वह किस प्रकार नष्ट होती है ?
श्रीभगवान् बोले—कौन्तेय ! अनात्मवस्तु देहमें आत्मभावनारूप यह वासना अज्ञानस्वरूप मोहसे उत्पन्न हुई है और परमात्माके यथार्थ अनुभवरूप ज्ञानसे यह विनष्ट हो जाती है। तुम पवित्रात्मा हो चुके हो और सत्य वस्तुका विवेक भी तुम्हें हो चुका है। अब तुम 'यह', 'वह', 'मैं' और 'ये लोग' इत्यादि-रूप वासनासे रहित हो जाओ। क्योंकि भारत ! दूसरेके अधीन न रहनेवाला, संकल्परहित और अविनाशी