भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४२६ * अविच्छिन्नान्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दृश्य संसारसे रहित है और वाणीसे अतीत है, उस अनुपम परम वस्तु परमात्माकी किसके साथ उपमा दी जा सकती है अर्थात् किसीके साथ नहीं। इसलिये अर्जुन ! तुम अभीष्ट कामनाओंकी निवृत्तिरूप युक्तिसे विषयात्मक विषसे उत्पन्न महामारीरूप अन्त:करणकी वासनाको निपुणतापूर्वक दूर कर संसारसे तथा सम्पूर्ण भयोंसे रहित परमात्मस्वरूप ही हो जाओ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार उपदेश देकर त्रिलोकीके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके क्षणभरके लिये मौन धारण कर सामने स्थित हो जाने-पर वहाँ (द्वापर युगमें) पाण्डुपुत्र अर्जुन पुनः यह वचन कहेगा।

अर्जुनने कहा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करनेवाले हैं। आपके वचनसे मेरी यह बुद्धि शोकरहित और ज्ञानसम्पन्न हो गयी है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकारके वचन कहकर और उठकर गाण्डीव-धनुर्धारी वह पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिसके सारथि श्रीकृष्ण होंगे, संदेह-रहित हुआ रणलीला करेगा। वह अर्जुन पृथ्वीको ऐसी रक्तकी महानदियोंसे पूर्ण कर देगा, जिनमें आहत हुए बड़े-बड़े हाथी, घोड़े, सारथि आदि बह जायँगे और आकाशको भी ऐसा बना देगा कि सूर्य बाणोंके तथा धूलिके समूहोंसे आच्छादित हो जायगा। (सर्ग ५६–५८)


परमात्माकी नित्य सत्ता, जगत्की असत्ता एवं जीवन्मुक्त-अवस्थाका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिससे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, जिसमें सम्पूर्ण जगत् स्थित रहता है, जो सम्पूर्ण जगत्स्वरूप है, जो सब ओर विद्यमान है और जो सर्वमय है, उसीको नित्य परमात्मा समझो। वह परमात्मा अश्रद्धालुके लिये दूर होता हुआ भी श्रद्धालुके लिये समीप ही है। वह सर्वव्यापी होनेसे सबमें स्थित है, एवं वास्तवमें ज्ञान और ज्ञेयसे रहित सच्चिदानन्द परमपदस्वरूप है। वही परमपद सबकी पराकाष्ठा है, वही सम्पूर्ण दृष्टियोंमें सर्वोत्तम दृष्टि है, वही सारी महिमाओंकी सर्वोत्तम महिमा है तथा वही गुरुओंका भी गुरु है। वही सबका आत्मा है और वही विज्ञान है, वही शून्यस्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परम कल्याण है, वही शान्त और मङ्गलमय शिव है, वही परम विद्या है और वही परम स्थिति है। उस परमात्मामें यह जगत् अविचारसे ही सत्य-सा प्रतीत होता है, किंतु वास्तवमें विवेकपूर्वक विचार करनेसे असत् है। आदि और अन्तसे रहित आकाशके समान व्यापक मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूँ, मुझसे अतिरिक्त यह संसार कुछ भी नहीं है—यों निश्चय करनेपर फिर ब्रह्मस्वरूप मुझमें परिमितता नहीं रह सकती। जो पुरुष इस प्रकारके निश्चयसे युक्त रहता है, वह बाहरसे लोक-शास्त्रकी मर्यादा-के अनुसार कार्य करनेपर भी वास्तवमें उत्पत्ति और विनाशसे रहित है। जिसका मन समसे-भी-सम ब्रह्ममें लीन होकर फिर न उदित होता है और न अस्त होता है एवं जिसकी बुद्धिमें मनका अभाव है, वह महात्मा ब्रह्मरूप ही है। एकमात्र ब्रह्मभावनासे अद्वितीय परमपद पर आरूढ़ हुआ वह महात्मा व्यवहार करता हुआ भी क्षोभको प्राप्त नहीं होता। व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषके हृदयमें मानापमानसे जनित सुख-दुःख आदि विकार तनिक भी नहीं होते, वह पुरुष मुक्तिका अधिकारी है।

वह शान्त चेतन परमात्मा अपने-आप ही अपनेमें संकल्प करता है। उसका संकल्प ही संसार है और उसके संकल्प-का अभाव ही परमपद है। इसलिये परमात्माके संकल्पका अभाव होनेसे ही इस संसारका अभाव हो जाता है। अतः मुनिलोग परमात्माके संकल्पको ही प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय