भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बेताल और राजाका संवाद * ४३१

बेताल और राजाका संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस अवस्थामें जीव ब्रह्म हो जाता है और चित्तका विनाश हो जाता है तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याका अन्त—अभाव हो जाता है, वही जीवात्माका मोक्ष कहा जाता है। मृगतृष्णा-जलकी तरह मिथ्या मन तथा अहंता आदि प्रपञ्च क्षणभरके लिये ही प्रतीत होते हैं और पूर्वोक्त विवेकपूर्वक विचारसे विलीन हो जाते हैं । भद्र ! इस संसाररूपी स्वप्न-विभ्रमके सम्बन्धमें बेतालद्वारा किये गये इन शुभ प्रश्नोंको तुम सुनो, जो मुझे प्रसङ्गवश स्मरण हो आये हैं । विन्ध्याचलके महान् वनमें एक विशालकाय वेताल रहता था । किसी समय वह गर्वमें भरकर प्राणियोंको मार डालनेकी इच्छासे किसी नगरमें गया । पहले वह वेताल किसी एक सज्जन नामक राजाके देशमें रहता था । उस राजाद्वारा किये गये अनेक वधके योग्य मनुष्योंकी बलिके उपहारसे सदा तृप्त होकर वह सुखसे रहता था । सामने आये हुए निरपराधी मनुष्यको वह भूखसे पीड़ित होनेपर भी अकारण नहीं मारता था; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष न्यायके ही पक्षपाती होते हैं । किसी समय न्यायोचित भक्ष्य न मिलनेके कारण अरण्यवासी वह बेताल क्षुधासे प्रेरित होकर न्यायप्राप्त मनुष्यका भक्षण करनेके लिये नगरके भीतर चला गया । उस नगरमें प्रजा-रक्षाके लिये रात्रिमें विचरण करता हुआ राजा उसे मिला । उस राजासे यह उग्र निशाचर भयंकर शब्दोंमें कहने लगा ।

वेतालने कहा—राजन् ! इस समय मुझ भयंकर वेतालके द्वारा तुम पकड़ लिये गये हो । कहाँ जा रहे हो ! अब तुम मर चुके । आज तुम-मेरे भोजन बन जाओ ।

राजाने कहा—निशाचर ! यदि तुम यहाँ बलपूर्वक अन्यायमार्गसे मुझे खा जाओगे तो निश्चय ही तुम्हारे मस्तकके हजारों टुकड़े हो जायेंगे ।

वेतालने कहा—राजन् ! मैं तुम्हें अन्यायपूर्वक नहीं खाऊँगा; परंतु तुम्हें मैं यह न्याय बतलाता हूँ कि तुम राजा हो, इसलिये तुम्हें अर्थियोंके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने चाहिये । मेरी इस याचनाको, जो पूर्ण करने योग्य है, तुम पूर्ण करो । मैं यहाँ तुमसे जो प्रश्न कर रहा हूँ, इनका भलीभाँति उत्तर दो । राजन् ! किस सूर्यकी किरणोंके ये ब्रह्माण्डरूपी छोटे अणु हैं और किस पवनमें महागगनरूपी त्रसरेणु स्फुरित होते हैं ! एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा पहलेके सैकड़ों या हजारों स्वप्नोंके अस्तित्वको छोड़ता हुआ भी किस प्रकाशक स्वच्छ वास्तविक स्वरूपका परित्याग नहीं करता ? जिस प्रकार केलेका खंभा भीतरके भी

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