संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीपरमात्मने नमः
संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वैराग्य-प्रकरण
सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना
यतः सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च।
यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नमः॥
सृष्टिके आरम्भमें सम्पूर्ण भूत जिनसे प्रकट होकर प्रतीतिके विषय होते हैं, स्थितिकालमें जिनमें ही स्थित होते हैं और प्रलयकाल आनेपर जिनमें ही लीन हो जाते हैं, उन सत्यस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।
ज्ञाता ज्ञानं तथा ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभूः।
कर्ता हेतुः क्रिया यस्मात् तस्मै ज्ञप्त्यात्मने नमः॥
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तथा कर्ता, कारण और क्रिया—इन सबका जिनसे ही आविर्भाव होता है, उन ज्ञानस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।
स्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्द्याम्बरेऽवनौ।
सर्वेषां जीवनं तस्मै ब्रह्मानन्दात्मने नमः॥
जिनसे स्वर्ग और भूतल आदि सभी लोकोंमें आनन्द-रूपी जलके कण स्फुरित होते हैं—प्राणियोंके अनुभवमें आते हैं तथा जो समस्त जीवोंके जीवनाधार हैं, उन पूर्ण चिन्मय आनन्दके महासागररूप परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है!
पूर्वकालमें सुतीक्ष्ण नामसे प्रसिद्ध कोई ब्राह्मण थे, जिनके मनमें संशय छा गया था; अतः उन्होंने महर्षि अगस्तिके आश्रममें जाकर उन महामुनिसे आदरपूर्वक पूछा—'भगवन्! आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं। आपको सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तका सुनिश्चित ज्ञान है। मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है, आप कृपापूर्वक इसका समाधान कीजिये। मोक्षका साधन कर्म है या ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं? इन तीनों पक्षोंमेंसे किसी एकका निश्चय करके जो वास्तवमें मोक्षका कारण हो, उसका प्रतिपादन कीजिये।'
अगस्तिने कहा—ब्रह्मन्! जैसे दोनों ही पक्षोंसे पक्षियोंका आकाशमें उड़ना सम्भव होता है, उसी प्रकार ज्ञान और निष्काम कर्म दोनोंसे ही परमपदकी प्राप्ति होती है। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जिसका
१. अगस्ति और अगस्त्य एक ही महर्षिके नाम हैं।