संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना * ४५३
श्रीरामजीने कहा—प्रभो ! जो-अनात्मज्ञ पुरुष हैं, वे अपनी सफलताके लिये अथवा जो आत्मज्ञ हैं, वे केवल लीलाके लिये किस क्रमसे इन सिद्धियोंको सिद्ध करते हैं, वह मुझसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—प्रिय राघव ! इस जगत्में सभी जगह ग्राह्य वस्तु तीन तरहकी होती है—उपादेय (ग्रहण करनेयोग्य), हेय (त्याज्य) और उपेक्षाके योग्य । सद्बुद्धे ! जो वस्तु साक्षात् या परम्परासे सुखदायक होती है, वह उपादेय होती है; जो सुख-विघातक होती है, वह हेय होती है एवं जो वस्तु इन दोनोंके बीचकी होती है, वह उपेक्ष्य होती है—ऐसा अनुभवी लोगोंका कहना है । परमात्मतत्त्वको जाननेवाले श्रेष्ठबुद्धि विद्वान्की दृष्टिमें जब यह सब परमात्मस्वरूप हो जाता है, तब इन तीनों पक्षोंमेंसे कोई भी पक्ष नहीं रहता । किसी समय ज्ञानी व्यवहारकालमें लीलासे ही इस समस्त जगत्को
उपेक्षा-बुद्धिसे केवल देखता है और समाधिकालमें नहीं देखता । ऐश्वर्यादि एक ही वस्तु ज्ञानीकी दृष्टिमें उपेक्षाके योग्य, मूढ़की दृष्टिमें उपादेय और उत्तम वैराग्यसम्पन्न पुरुषकी दृष्टिमें हेय हो जाती है । श्रीराम ! आकाशगमन आदि सिद्धियोंका क्रम कैसा है, उसे तुम अब सुनो । देश, काल, क्रिया एवं द्रव्यकी अपेक्षा रखनेवाली सब तरहकी सिद्धियों यहाँ जीवको मोहित करती हैं । मणि, ओषधि, तप, मन्त्र और क्रियासे होनेवाली सिद्धिके क्रमका निरूपण अनावश्यक, है; क्योंकि यह अध्यात्मविषयमें विघ्न ही है । कृतार्थ श्रीराम ! सिद्धदेशके नामसे प्रसिद्ध श्रीशैल अथवा मेरु पर्वत-पर निवास करनेवाले पुरुषको सिद्धि होती है—उसका भी विस्तारपूर्वक वर्णन करना अध्यात्मविषयमें हानिकर है । इसलिये शिखिध्वजकी कथाके प्रसङ्गसे प्राप्त सिद्धिरूपी फलसे युक्त इस प्राणादि वायुकी अभ्यास-क्रियाको तुम श्रवण करो । साध्य अर्थसे भिन्न पदार्थोंकी वासनाओंका त्याग करके गुदा आदि द्वारोंके संकोचसे; सिद्धादि आसन, काया, मस्तक और गर्दनकी समता, निश्चलता तथा नासिकाके अग्रभागमें दृष्टिको स्थिर करना आदि योगशास्त्रोक्त क्रियाओंसे; भोजन और आसनकी पवित्रतासे, भलीभाँति योगशास्त्रके परिशीलनसे, उत्तम आचरणसे, सज्जनोंके सङ्गसे, सर्वत्यागसे, सुखासनसे बैठकर कुछ कालतक प्राणायामके दृढ़ अभ्याससे, क्रोध-लोभ आदिके सर्वथा त्यागसे तथा भोगोंके त्यागसे एवं रेचक, पूरक और कुम्भकका अच्छी तरह अभ्यास हो जानेपर प्राणोंपर पूर्ण प्रभुत्व हो जानेसे योगीके पाँचों प्राण उसी तरह उसके अधीन हो जाते हैं, जिस तरह राजाके सेवक राजाके वशमें होते हैं ।
राघव ! प्राणायामके द्वारा देहमें स्थित प्राण-समान वायुके अपने अधीन हो जानेपर राज्यसे लेकर मोक्षपर्यन्त सभी सम्पत्तियाँ सुखसाध्य हो जाती हैं । मण्डलाकार (गोल कुण्डलाकार) से युक्त, मर्म (नाभि) स्थानमें