संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०] * राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार * ४५९
विसर्जन हुई और सभी सभासद् मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके सायंकालीन विधिका सम्पादन करनेके लिये स्नान करने चले गये और रात्रि व्यतीत होनेपर पुनः सूर्योदय होते-होते सभामें जुट गये । (सर्ग ८५-८६)
राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, कुम्भका ब्रह्माजीके द्वारा किये हुए ज्ञान और कर्मके विवेचनको सुनाना, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार
राजा शिखिध्वजने कहा— 'देवकुमार ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि जैसे आँधी मेघोंको उड़ाकर पर्वतपर पहुँचा देती है, उसी प्रकार मेरी संचित पुण्यराशिने अप्रकटरूपसे फलदानोन्मुख होकर आपको यहाँ भेजा है। साधो ! आपके वचनोंसे तो मानो अमृत टपक रहा है, अतः आपके साथ आज जो मेरा समागम हो गया, इससे अब मैं धर्मात्माओंकी गणनामें सर्वप्रथम गिना जाऊँगा । प्रभो ! साधु-समागमसे चित्तको जैसी शान्ति उपलब्ध होती है, वैसी शान्ति राज्य-लाभ आदि कोई भी पदार्थ नहीं दे सकते; क्योंकि सत्सङ्ग होनेपर सामान्यरूपसे अपरिमित ब्रह्मानन्दरूप सुख प्रकट होने लगता है, जिससे कल्पनाजनित सुख प्रदान करनेवाले रागादि दोषोंका विचार ही नष्ट हो जाता है।
(देवपुत्रके वेषमें) चूडाला बोली— 'साधुश्रेष्ठ ! सुनिये इस कथाको । मैंने तो आपके प्रश्नानुसार अपना सारा वृत्तान्त आपको बता दिया । अब आप मुझे अपना परिचय दीजिये— आप कौन हैं ? इस पर्वतपर क्या कर रहे हैं ? आपको अरण्यवास करते कितना समय बीत गया और इससे आप अब कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहते हैं ?— यह सब बताइये ।
शिखिध्वजने कहा— भगवन् ! आप तो स्वयं ही देवकुमार हैं, अतः लोकवृत्तान्त और परमार्थतत्त्वके पूर्ण ज्ञाता हैं। मेरे विषयमें भी आप सब कुछ यथार्थ रूपसे जानते ही हैं, फिर, इसके अतिरिक्त मैं और क्या कहूँ। आर्य ! यद्यपि आप मुझे जानते हैं, फिर भी मैं आपसे अपना परिचय संक्षेपमें दे रहा हूँ, सुनिये । मैं शिखिध्वज नामका राजा हूँ और अपने राज्यका परित्याग करके यहाँ चला आया हूँ। मैं नाना-भयसे भीत हो गया हूँ, अतः इस वनमें निवास करता हूँ। तत्त्वज्ञ ! मुझे सबसे बड़ा भय तो इस बातका है कि कहीं संसारमें मेरा पुनर्जन्म न हो जाय । यद्यपि मैं दिग्दिगन्तोंमें भ्रमण कर रहा हूँ और कठोर तप भी कर रहा हूँ, तथापि मुझे अभी आन्तरिक शान्ति प्राप्त नहीं हुई है, शास्त्रोक्त प्रक्रियाका समुचित रूपसे सम्पादन करनेपर भी मुझे दुःख-पर-दुःख ही मिलते जा रहे हैं और मेरे लिये अमृत भी विषवत् हो गया है। (भगवन् ! इसका क्या कारण है ?)
(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली— सखा ! पहले किसी समय मैंने अपने पितामह ब्रह्माजीसे ऐसा प्रश्न किया था— 'प्रभो ! ज्ञान और कर्म— इन दोनोंमें जो एकमात्र श्रेयस्कर हो, उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ।'