भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके तथा हाथीके रहस्यका वर्णन * ४६१

उसकी व्यथा भी दूर हो गयी। इतने ऊँचे ताड़वृक्षकी चोटीसे गिरनेपर भी उसका अङ्ग-भङ्ग नहीं हुआ था। वह पैदल चलनेमें बड़ा उत्साही था। इस प्रकार जब उस हाथीके शत्रु महावतका प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ और हाथी उसके हाथसे निकल गया, तब उसे महान् दुःख हुआ। वह पुनः यत्नपूर्वक वनमें झाड़ियोंमें छिपे हुए उस हाथीकी खोज करने लगा। चिरकालके पश्चात् उसे वही गजराज मिला, जो एक जंगलमें वृक्षके नीचे बैठकर विश्राम कर रहा था। तब उस धूर्त महावतने, जहाँ वह हाथी बैठा था, उसके समीप ही हाथीके फँसाने योग्य एक गोलाकार गड्ढा खोदकर तैयार किया और ऊपरसे उसे कोमल लताओंसे ढक दिया।

कुछ ही दिनोंके बाद जब वह हाथी वनमें विहार कर रहा था कि यकायक उसी गड्ढेमें जा गिरा। तब उस महावतने गड्ढेमें गिरे हुए उस हाथीको पुनः सुदृढ़रूपसे बाँध दिया, जो आज भी भूगर्भमें पड़ा दुःख भोग रहा है। यदि वह हाथी अपने सामने गिरे हुए शत्रुको पहले ही मार डाले होता तो आज उसे शत्रु-द्वारा गर्तबन्धनरूप दुःखकी प्राप्ति नहीं हुई होती। जो मनुष्य मूर्खतावश वर्तमान क्रियाओंद्वारा आगामी कालका शोधन नहीं कर लेता, वह विन्ध्यगिरिनिवासी गजराजकी भाँति ही दुःखका भागी होता है। वह हाथी 'मैं शृङ्खलाबन्धनसे मुक्त हो गया हूँ' इतने मात्रसे ही संतुष्ट हो गया; परंतु दूर चले जानेपर भी वह पुनः अज्ञानवश बन्धनमें पड़ गया। भला, मूर्खता कहाँ नहीं बाधा पहुँचाती अर्थात् सर्वत्र बाधा देती ही है। महात्मन् ! 'बद्ध हुआ भी मैं बन्धनरहित हूँ' इस प्रकारकी चित्तगत मूर्खताको ही परम बन्धन समझना चाहिये। अतः उससे छुटकारा पानेके लिये परमात्माके स्वरूपसे उत्पन्न सम्पूर्ण त्रिलोकीको परमात्माका स्वरूप समझना चाहिये। जिसे इस प्रकारका ज्ञान नहीं है और जो मूर्खतामें स्थित है, उसके लिये वह स्वयं ही सहसा समस्त बन्धनोंका कारण बन जाता है। (सर्ग ८८-८९)


कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके आख्यानके तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीके उपाख्यानके रहस्यका वर्णन

राजा शिखिध्वजने कहा—देवपुत्र ! आपने चिन्ता-मणिकी प्राप्ति तथा विन्ध्यगिरिनिवासी गजराजके बन्धन आदिका जो कथाप्रसङ्ग मुझे सुनाया है, उसका अब स्पष्टीकरण कीजिये।

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली—राजन् ! मैंने आपको जो विचित्र कथा सुनायी थी, उसका रहस्य भी सुनिये। महीपते ! उसमें जो वह शास्त्रार्थकुशल किंतु तत्त्वज्ञानमें मूर्ख चिन्तामणिका साधक बतलाया गया है, वह तो आप ही हैं। साधो ! अकृत्रिम सर्वस्व-त्यागको चिन्तामणि समझिये, जो सम्पूर्ण दुःखोंका अन्त करने-वाली है। शुद्ध बुद्धिपूर्वक आप उसीका साधन कर रहे हैं। किंतु निष्पाप राजन् ! वास्तविक शुद्ध सर्व-त्यागसे ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, कृत्रिम त्यागसे नहीं। यद्यपि आपने स्त्री-पुत्र धन-दौलत और बन्धु-बान्धवोंसहित सम्पूर्ण राज्यका परित्याग कर दिया है और अपने देशसे बहुत दूर आकर इस आश्रममें अपना निवासस्थान बनाया है तथापि आपके इस सर्वस्व-त्यागमें अभी अहंकारका त्याग शेष रह गया है। अभी आपके मनमें ऐसी धारणा बनी हुई है कि यह सर्वस्व-त्याग वह महान् अभ्युदयशाली परमानन्द नहीं है। वह तो इससे भी उत्कृष्ट कोई दूसरी महान् वस्तु है, जो चिरकालकी साधनासे उपलब्ध होती है। ऐसी चिन्ता करनेसे धीरे-धीरे जब आपके स्वरूप-ग्रहणमें पर्याप्त वृद्धि हो गयी, तब वह त्याग कहीं कटकर नष्ट-