भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

देनेपर ही आप परम अशोक-पदको प्राप्त कर सकेंगे।

शिखिध्वज बोले—अच्छा, यदि ये वन आदि सारी वस्तुएँ मेरी नहीं हैं तो बावली और चबूतरा आदिसे युक्त यह मेरा आश्रम ही मेरा सर्वस्व है। मैं इसका अभी त्याग किये देता हूँ।

कुम्भने कहा—राजन् ! ये जो वृक्ष, बावली (जलाशय), चबूतरा, गुल्म, आश्रम और लताओंकी पंक्तियाँ हैं, इनमेंसे कुछ भी आपका नहीं है; फिर आपका सर्वत्याग कैसे सिद्ध हुआ ? अभी तो आपका सबसे उत्तम भाग पड़ा ही है, आपने उसका त्याग किया ही नहीं। उसका पूर्णरूपसे त्याग कर देनेपर ही आपको उत्कृष्ट अशोक-पद मिल सकेगा।

शिखिध्वज बोले—ठीक है, यदि ये सारी वस्तुएँ मेरी नहीं हैं तो ये पात्र आदि तथा मृगचर्म, दीवाल और कुटीर आदि ही मेरे सर्वस्व हैं। मैं इन्हींको छोड़ रहा हूँ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर राजा शिखिध्वजने भाण्ड आदि उन समस्त सामग्रियोंको आश्रमसे निकालकर एक जगह स्थापित किया, फिर सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके अग्नि प्रज्वलित की और उन सभी वस्तुओंको उस आगमें डालकर वे पुनः अपने आसनपर बैठ गये। तत्पश्चात् उन्होंने अक्षमाला तथा मृगचर्मको भी उसी आगमें झोंक दिया और कमण्डलु एक श्रोत्रिय ब्राह्मणको दे दिया; क्योंकि ऐसा नियम है कि अपनी जो उत्तम वस्तु हो, उसे या तो किसी महात्माको दे दे अथवा अग्निमें जला दे। फिर राजाने अपनी कोमल चटाईको भी चित्तशुद्धि तथा चेतन ब्रह्ममें विश्राम प्राप्तिके लिये उसी धधकती आगमें फेंक दिया। फिर कुम्भको सम्बोधन करके वे बोले—'कुम्भ ! जो वस्तु त्याज्य है, उसे सदा शीघ्र-से-शीघ्र त्याग देना चाहिये। साधो ! मैं निष्क्रिय होनेके लिये अपनी क्रियोपयोगी सारी वस्तुओंका त्याग कर रहा हूँ; क्योंकि अयोग्य वस्तुको कौन ढोता फिरे।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर राजा शिखिध्वजने अपनी सूखी फूसकी कुटियाको, जो अपने अज्ञानी मनके मिथ्याभूत संकल्पद्वारा कल्पित थी, जलाकर भस्म कर दिया। उन मौनी राजाकी बुद्धि समतायुक्त हो गयी थी और मन उद्वेगरहित हो गया था, अतः उन्होंने वहाँ जो कुछ भी सामग्री शेष रह गयी थी, उस सबको क्रमशः जला दिया। यहाँतक कि उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी लँगोटी और भोजनपात्र तथा भोजन आदिको भी फूँक दिया। जब सूखी लकड़ीके साथ-साथ वे बर्तन आदि सारे पदार्थ आगमें जल रहे थे, उस समय जिनका देहमात्र शेष रह गया था वे राजा शिखिध्वज रागरहित हो प्रसन्नतापूर्वक बोले।

शिखिध्वजने कहा—देवकुमार ! आश्चर्य है, चिरकालके पश्चात् आपने अपने ज्ञानोपदेशद्वारा मुझे प्रबुद्ध कर दिया, जिससे अब मैं वस्तु-विषयक वासनाका परित्याग करके सर्वत्यागी होकर स्थित हूँ तथा केवल, शुद्ध, सुखसे सम्पन्न और ज्ञानवान् हो गया हूँ। जिसमें ममता-संकल्पप्रयुक्त संग्रहक्रम वर्तमान है, ऐसी यह सामग्री किस कामकी। अब तो नाना प्रकारके बन्धनोंके हेतुभूत विषय ज्यों-ज्यों प्रक्षीण होते जा रहे हैं, त्यों त्यों मेरा मन परमानन्दमें निमग्न होता जा रहा है। मुझे शान्ति मिल रही है। मैं परमानन्दरूपको प्राप्त हो रहा हूँ और विजयी हो रहा हूँ; अतः अब मैं पूर्ण सुखी हूँ। मेरे सम्पूर्ण बन्धन नष्ट हो गये; क्योंकि मैंने सर्वत्याग कर दिया। देवपुत्र ! महान् त्याग करनेके कारण अब दिशाएँ ही मेरे लिये वस्त्र हैं और दिशाएँ ही मेरे लिये घर हैं। यहाँतक कि मैं स्वयं ही दिशाओंके समान स्थित हूँ। अब बताइये और क्या शेष रह गया है !

कुम्भने कहा—महाराज शिखिध्वज ! अभी भी आपने सभी वस्तुओंका पूर्णतया त्याग नहीं किया है,