संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय * ४६७
चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय और अविद्यारूप कारणके अभावसे देह आदि कार्यके अभावका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार चित्तके परित्यागका उपाय कुम्भ ऋषिके बतलानेपर अपने अन्तःकरणमें बार-बार विचार करते हुए वे सौम्य राजा शिखिध्वज यह वचन बोले।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! जाल जैसे व्याकुल मछलीको पकड़ लेता है, वैसे ही इस चित्तको पकड़ लेना तो मैं जानता हूँ, परंतु इसका त्याग मैं नहीं जानता। भगवन् ! सबसे पहले तो आप मुझे चित्तका क्या स्वरूप है, यह ठीक-ठीक कहिये। इसके बाद प्रभो ! चित्तके परित्यागकी यथावत् विधि बतलाइये।
कुम्भ बोले—महाराज ! वासनाको ही चित्तका स्वरूप समझिये। उसका त्याग अत्यन्त सुगम और सुखसाध्य है। राज्यकी अपेक्षा उस त्यागमें अधिक आनन्द है और पुष्पकी अपेक्षा वह अधिक सुन्दर है। मूर्खके लिये तो चित्तका परित्याग करना उतना ही दुःसाध्य है, जितना कि पामरके लिये साम्राज्य प्राप्त करना।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! आपके वचनसे चित्तका स्वरूप वासनामय है, यह तो जानता हूँ, परंतु उसका परित्याग वज्रको निगल जानेकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ। यह चित्त संसाररूपी सुगन्धित पुष्प है, दुःखरूपी दाहजनक अग्नि है तथा शरीररूपी यन्त्रका संचालक है। इसका अनायास त्याग जिस तरह होता हो, वह बतलाइये।
कुम्भ बोले—साधो ! इस चित्तका सर्वथा नाश ही संसारका भी नाश है, वही चित्तका अच्छी प्रकारसे त्याग है—ऐसा दीर्घदर्शी महात्माओंने कहा है।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये मैं चित्त-त्यागकी अपेक्षा तो चित्तका विनाश ही विशेष अच्छा समझता हूँ, परंतु सैकड़ों व्याधियोंके मूल इस चित्तका अभाव कैसे होता है ?
कुम्भ बोले—राजन् ! शाखा, फल और पल्लवोंसे युक्त चित्तरूपी वृक्षका अहंकार ही बीज है। अतः आप उस वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकिये और अपना हृदय आकाशके सदृश निर्मल बना डालिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! चित्तका मूल क्या है, अङ्कुर क्या है और इसका कौन-सा खेत है, इसकी शाखाएँ और स्कन्ध कौन हैं तथा यह मूलसहित कैसे उखाड़कर फेंक दिया जाता है ?
कुम्भ बोले—महामते ! यह अहंकार ही इस चित्तरूपी वृक्षका बीज (मूल) है, इसे आप जान लीजिये। परमात्माकी माया ही इस मायामय संसारका खेत है। इसलिये इस चित्तका भी वह परमात्माकी माया ही खेत है। इस प्रथम उत्पन्न मूलसे अज्ञान-देहमें आत्मविषयक निश्चय (बुद्धि) ही इसका अङ्कुर है। जो निराकार निश्चयात्मक समझ है, वही बुद्धि कही जाती है। इस बुद्धि नामक अङ्कुरकी जो सङ्कल्परूप स्थूलता उत्पन्न होती है, उसका चित्त और मन नाम पड़ा हुआ है। ये इन्द्रियाँ ही इस चित्तरूपी वृक्षकी दूरतक फैली हुई लंबी विस्तृत शाखाएँ हैं और जन्म-मरणरूप हजारों अनर्थोंके कारण शुभ और अशुभरूप फलोंसे परिपूर्ण जो तुच्छ विषयभोग हैं, वे इसकी बड़ी-बड़ी अवान्तर शाखाएँ हैं। इस तरहके इस कठिन चित्तरूपी वृक्षकी शाखाओंका (विषयभोगोंमें आसक्तिका) वैराग्यसे प्रतिक्षण छेदन करते हुए आप इसके उदयकारण मूलको उखाड़ फेंक देनेवाले सच्चिदानन्द परमात्माके चिन्तनमें पूर्ण प्रयत्न कीजिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! विद्वान् पुरुषों