संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना *
अपने धर्मको समझिये। उसका परित्याग न कीजिये।
ये मुनि तीनों लोकोंका शासन करनेमें समर्थ हैं, आपको इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। राजन्! 'करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके यदि आप उसका पालन नहीं करते तो यह मिथ्याभाषण आपके इष्ट और आपूर्त (यज्ञ-यागादि तथा वापी, कूप आदिके निर्माणसे होनेवाले पुण्य) को हर लेगा। इसलिये श्रीरामको विश्वामित्रजीके हाथमें सौंप दीजिये। आप इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए हैं और स्वयं विख्यात राजा दशरथ हैं। यदि आप अपने वचनका पालन नहीं करते तो दूसरा कौन करेगा ? ये विश्वामित्रजी धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। ये बल और पराक्रमसे सम्पन्न वीरपुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। संसारमें सबसे अधिक बुद्धिमान् हैं तथा तपस्याके परम आश्रय हैं। चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें यह प्रसिद्ध है कि ये विश्वामित्रजी नाना प्रकारके अस्त्रोंको जानते हैं। जिन अस्त्रोंका इन्हें ज्ञान है, उन्हें दूसरा कोई पुरुष न तो जानता है और न भविष्यमें जान
सकेगा। देवता, ऋषि, असुर, राक्षस, नाग, यक्ष, गन्धर्व—ये सब एक साथ मिलकर आ जायँ, तो भी विश्वामित्र मुनिकी समानता नहीं कर सकते। जिन दिनों ये विश्वामित्रजी राज्य करते थे, उन दिनों में इनकी तपस्यासे संतुष्ट हुए रुद्रदेवने कृशाश्वद्वारा उत्पन्न किये गये अस्त्रोंका दान किया था। वे अस्त्र दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं। उन अस्त्रोंके अभिमानी देवता कृशाश्वके पुत्र हैं और संहार करनेमें प्रजापतिके पुत्र रुद्रदेवकी समानता करते हैं। उन कान्तिमान्, महातेजस्वी और बल-विक्रमशाली अस्त्र-देवताओंने भी इनका अनुसरण किया है (क्योंकि इन्होंने अपनी तपस्या के प्रभावसे उन्हें सदाके लिये वशमें कर लिया है)। ये विश्वविख्यात महातेजस्वी विश्वामित्र ऐसे महाशक्तिशाली हैं, अतः श्रीरामको इनके साथ भेजनेमें आप अपने हृदयको व्याकुल न होने दें। ये महामुनीश्वर महान् प्रभावशाली हैं। साधु स्वभाववाले नरेश ! जिस पुरुषके समीप खड़े हों, वह मृत्युके आ जानेपर भी अमरत्वको ही प्राप्त होगा। अतः आप मूढ़ मनुष्यों की भाँति अपने मनमें दीनताको स्थान न दीजिये।
भरद्वाज ! जब वसिष्ठजी ऐसी बातें कहकर समाप्त कर लगे, तब राजा दशरथका चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपने पुत्र श्रीराम तथा लक्ष्मणको बुलानेके लिये द्वारपालको पुकारा—'प्रतीहार ! तुम सत्य-परायण, महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणको विश्वामित्रके पुण्यमय यज्ञकी निर्विघ्न सिद्धिके लिये शीघ्र यहाँ बुला ले आओ।'
महाराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर वह द्वारपाल अन्तःपुरके श्रीराम-मन्दिरमें गया और दो ही घड़ीमें वहाँसे लौटकर उन भूपालसे बोला—'देव ! अपने बाहुबलसे समस्त शत्रुदलका दर्प दलन करनेवाले महाराज ! जैसे भ्रमर रातको कमलमें बंद होकर उदास बैठा रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी भी अपने भवनमें अनमने होकर बैठे हुए हैं।'