भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

वैराग्य-प्रकरण] * विश्वामित्रकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर मस्तक सूँघना * ३३

द्वारा वे बारंबार गुनगुनाते रहते हैं। यदि पास बैठा हुआ कोई सेवक उनका अभिनन्दन करते हुए यह कहे कि 'आप सम्राट् हों तो वे उसके इस कथनको उन्मत्त प्रलाप-सा समझकर अन्यमनस्क हो हँसने लगते हैं तथा सदा मुनिवृत्तिसे रहते हैं। न तो किसीकी कही हुई बातको सुनते हैं और न सामने पड़ी हुई वस्तुकी ओर दृष्टिपात ही करते हैं। सुन्दर-से-सुन्दर वस्तु प्राप्त होनेपर भी सर्वत्र उसकी अवहेलना ही करते हैं। जैसे मेघद्वारा बरसाये गये जलकी धाराएँ किसी बड़े भारी दुर्भेद्य पत्थरका भेदन नहीं कर सकतीं, उसी प्रकार कामदेवके बाण कान्तिमती वनिताओंके बीचमें रहते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीके मनका भेदन नहीं कर पाते । 'धन आपत्तियोंका एकमात्र स्थान है। तू इसकी इच्छा क्यों करता है ?' श्रीरामचन्द्रजी सबको ऐसी ही शिक्षा देते हैं और अपना सारा धन उसकी इच्छा रखनेवाले दीन याचकोंको बाँट देते हैं। 'यह आपत्ति है, यह सम्पत्ति है—इस प्रकारकी कल्पनाओंके रूपमें केवल मनका मोह (अज्ञान) ही प्रकट होता है।' इस तरहके श्लोकोंका वे सदा गान किया करते हैं। 'हाय ! मैं मारा गया, मैं अनाथ हो गया—इस प्रकार सब लोग चीखते-चिल्लाते रहते हैं, तो भी किसीको इस संसारसे वैराग्य नहीं होता--यह कितने आश्चर्यकी बात है !' श्रीराम प्रायः ऐसी ही बातें कहा करते हैं।' (सर्ग ९-१०)

विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचारमूलक वैराग्यका कारण बताना

तब विश्वामित्रजीने कहा—परम बुद्धिमान् सत्पुरुषो ! यदि ऐसी बात है तो जैसे मृगोंका झुंड अपने यूथपतिको ले आता है, उसी प्रकार आपलोग भी रघुकुलनन्दन श्रीरामको शीघ्र यहाँ बुला लाइये। श्रीरामचन्द्रजीको यह मोह न तो किसी आपत्तिसे हुआ है और न आसक्तिसे ही। वे विवेक और वैराग्यसे सम्पन्न हैं अतः उन्हें मोह नहीं, बोध ही प्राप्त हुआ है, जो महान् अभ्युदयकारक है। इस विचारमूलक मोहका युक्तिद्वारा निवारण कर देनेपर रघुकुलनन्दन श्रीराम हमलोगोंकी ही भाँति परम पदमें प्रतिष्ठित हो जायँगे। हमारे उपदेशसे वास्तविक बोधका उदय हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अमृत पीये हुए पुरुषकी भाँति सत्यता १ (त्रिकालाबाधित ब्रह्मरूपता), मुदिता २ (परमानन्दरूपता), प्रज्ञा ३ (अपरिच्छिन्न ज्ञानरूपता) को प्राप्त होकर विश्रान्ति-सुखसे सम्पन्न, संतापशून्य, शरीरसे हृष्ट-पुष्ट और उत्तम कान्तिसे युक्त हो जायँगे। फिर तो मनमें अपनी पूर्णताका अनुभव करते हुए माननीय श्रीरामचन्द्रजी अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त होनेवाली व्यवहार-परम्पराका निर्बाधरूपसे पालन करने लगेंगे। वे महान् सत्त्वगुणसे युक्त तथा लोकव्यापी निर्गुण-सगुणरूप परब्रह्म परमात्माके ज्ञानसे सम्पन्न हो जायँगे। उन्हें सुख-दुःखोंकी दशाएँ नहीं प्राप्त होंगी। वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें कोई अन्तर नहीं देखेंगे—इन सबको समान समझने लगेंगे।

मुनीश्वर विश्वामित्रके यों कहनेपर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए, मानो उनका सारा मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको बुला लानेके लिये बारंबार दूत-पर-दूत भेजना आरम्भ किया। जब राजा और मुनिका संवाद हो रहा था, उसी समय श्रीरामचन्द्रजी अपने थोड़े-से सेवकों और दोनों भाई लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नके साथ अपने पिताके पवित्र स्थान—राजसभामें गये। श्रीरामने दूरसे ही महाराज दशरथको देखा। जैसे इन्द्र देवसमूहसे


१-३. अमृत पीये हुए पुरुषके पक्षमें सत्यताका अर्थ यथार्थ स्वर्गसुख, मुदिताका अर्थ आनन्द तथा प्रज्ञाका अर्थ उत्तम बुद्धि समझना चाहिये। अन्य शब्दोंके अर्थ उभय पक्षमें समान ही हैं।