भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 668

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण * ६२१

यह परमात्मबोध संसार-मार्गके भ्रमको हर लेनेवाला है। जो न तो पिताने, न माताने और न शुभ कर्मोंने ही अबतक सिद्ध किया है, वही आपका परम कल्याण यह महारामायण-शास्त्र तत्काल सिद्ध कर देगा, यदि आप अभ्यासपूर्वक इसे भलीभाँति जान लें। साधुशिरोमणे ! यह संसार-बन्धनमयी विषूचिका (हैजा) बड़ी भयंकर है और दीर्घकालतक टिकी रहनेवाली है। आत्मज्ञानके सिवा दूसरी किसी दवासे यह कभी शान्त नहीं होती।

मनुष्यो ! आपातमधुर, शून्य एवं निस्सार विषयोंका आस्वादन करते हुए तुमलोग खाली हवा चाटनेवाले सर्पोंके समान आकाशरूपी अनन्त संसारकी ओर पैर न बढ़ाओ। बड़े कष्टकी बात है कि तुम्हारे दिन केवल लौकिक व्यवहारमें ही इस तरह बीत रहे हैं कि वे कब आये और कब गये, इसका तुम्हें पता ही नहीं लगता। इन्हीं बीतते हुए दिनोंके द्वारा तुमलोग केवल अपनी मौतकी राह देख रहे हो। लोगो ! तुम मान और मोहसे रहित होकर तत्त्वज्ञानके द्वारा उत्तम मोक्ष-पदको प्राप्त करो। अधम संसार-गतिमें न पड़ो। आत्मज्ञानके द्वारा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका मूलोच्छेद कर दिया जाता है। जो आज ही मरणरूपी आपत्तिसे बचनेका उपाय नहीं करता है, वह मूढ़ रुग्णावस्थामें, जब मौत सिरपर सवार हो जायगी, तब क्या करेगा ?

आदरणीय सभासदो ! मैं न तो मनुष्य हूँ, न गन्धर्व हूँ, न देवता हूँ, न राक्षस ही हूँ, अपितु आप लोगोंका सूक्ष्म संविद्रूप विशुद्ध आत्मा हूँ और इस प्रकार उपदेश देनेके लिये यहाँ बैठा हूँ। आपलोग भी शुद्ध चैतन्यमात्र ही हैं। अत्यन्त निर्मल चिन्मात्रस्वरूप मैं आपलोगोंके पुण्यसे ही यहाँ उपस्थित हूँ। आपकी आत्मासे भिन्न नहीं हूँ। जबतक मौतके काले दिन नहीं आ रहे हैं, तभीतक सब वस्तुओंमें वैराग्यरूपी पहला सार पदार्थ समेटकर रख लो। जो इस शरीरमें रहते हुए ही नरकरूपी रोगकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह औषधशून्य प्रदेश (परलोक) में पहुँचकर उस रोगसे पीड़ित होनेपर क्या करेगा ? जबतक समस्त पदार्थोंकी ओरसे वैराग्य नहीं प्राप्त होता, तबतक उन पदार्थोंकी वासना क्षीण नहीं होती है। महामते ! आत्माका पूर्णरूपसे उद्धार करनेके लिये वासनाको क्षीण करनेके सिवा दूसरा कोई उपाय कभी सफल नहीं होता। पदार्थोंकी सत्ता होती है, तभी उनमें अनुकूलता बुद्धि होनेसे वासना होती है। किंतु ये पदार्थ तो खरगोशके सींग आदिकी भाँति हैं ही नहीं। (फिर उनमें वासना बनी रहनेका क्या कारण है ?) जगत्के सभी पदार्थ तभीतक मनोहर प्रतीत होते हैं, जबतक कि उनके स्वरूपपर सम्यक् विचार नहीं किया जाता। विचार करनेपर उनकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती। अतः वे जीर्ण-शीर्ण होकर न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं। (सर्ग १०३)

मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निर्मल आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर जो लौकिक दुःख और सुखसे रहित अक्षय परमानन्दरूपता प्राप्त होती है, वही मोक्ष है। वह शरीरके रहने या न रहनेपर भी समानरूपसे ही उपलब्ध होता है। उसी मोक्ष-सुखमें सबका पूर्ण विश्राम हो।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—स्वप्न और जाग्रत्-दोनों एक समान कैसे हो सकते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें स्वप्नगत बन्धुजनोंके साथ विहार करनेके पश्चात् वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है। स्वप्न-शरीरकी निवृत्ति ही स्वप्नद्रष्टाकी मृत्यु है। स्वप्न-संसार