भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३६* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बहुत समयके बाद यह जाना है कि हम मूढ़ जीव व्यर्थ ही मोहमें पड़े हुए हैं। मुझे राज्यसे क्या लेना है और भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है ? मैं कौन हूँ ? यह दृश्य-प्रपञ्च क्या है और किस लिये सामने आया है ? जो मिथ्या है, वह मिथ्या ही रहे। उसके मिथ्या होनेसे किसकी क्या हानि होनेवाली है। ब्रह्मन् ! जैसे यत्र-तत्र भ्रमण करनेवाले पथिकको मरुभूमिसे विरक्ति हो जाती है, वैसे ही इस प्रकार विचार करते-करते सभी भोग्य पदार्थोंसे मेरी अरुचि हो गयी है।

मुनीश्वर ! देखिये, भिन्न-भिन्न रूपोंमें उपलब्ध होनेवाले उन तुच्छ भोगोंने हमको उसी प्रकार जर्जर बना दिया है, जैसे प्रचण्ड वायु पर्वतीय वृक्षोंको जर्जर कर देती है। सब लोग अचेतन-से होकर प्राणनामधारी पवनसे प्रेरित हो व्यर्थ ही शब्दोच्चारण कर रहे हैं, जैसे कीचक नामक बाँस अपने छेदोंमें हवा भर जानेसे बाँसुरीकी-सी ध्वनि करने लगते हैं। संसारकी सम्पदाएँ सदा सबकी वञ्चना करती रहती हैं। ये मनुष्योंकी मनोवृत्तिको मोह लेती हैं, उनकी सद्गुण-राशिका नाश कर देती हैं और तरह-तरहके दुःख दिया करती हैं। दुःखोंका जाल-सा बिछाती रहती हैं। ये धन-वैभव चिन्ताओंके चक्करमें डालनेवाले हैं, इसलिये मुझे आनन्द नहीं देते तथा बच्चोंवाली स्त्रियोंसे भरे हुए घर भी भयानक विपत्तियोंके आवास-स्थानकी भाँति मुझे दुःख ही प्रदान करते हैं, सुख नहीं। मुने ! जैसे बाँस और तिनकोंसे आच्छादित गर्तमें गिरनेके कारण प्राप्त होनेवाले क्षुधा, पिपासा आदि दोषोंका तथा बन्धन आदि दुर्दशाओंका विचार करते रहनेसे बँधे हुए हाथीको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार देह आदि पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताके कारण उनमें अनेक प्रकारके दोषों और दुर्दशाओंका स्मरण करके मेरे मनको भी शान्ति नहीं मिल रही है। अज्ञानरूपी रात्रिमें तीव्र मोहरूपी कुहरेसे लोगोंकी ज्ञानरूपी ज्योतिके नष्ट हो जानेपर दूसरोंको दुःख देनेमें परम चतुर विषयरूपी सैकड़ों चोर हर समय और प्रत्येक दिशामें विवेकरूपी श्रेष्ठ रत्नका अपहरण करनेके लिये जी-जानसे लगे हुए हैं। युद्धमें उन्हें मार भगानेके लिये तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको छोड़कर दूसरे कौन-से सुभट समर्थ हो सकते हैं (तत्त्वज्ञानी ही उनको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, दूसरे नहीं)। (सर्ग ११-१२)

धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! यह लक्ष्मी, यह धन-सम्पत्ति संसारमें यदि स्थिर होकर रहे तो बहुत-से सुखोंकी साधनभूत होनेके कारण वह सबसे उत्कृष्ट वस्तु है—यह मूढ़ मनुष्योंकी ही कल्पना है। वास्तवमें न तो वह कभी स्थिर रहती है और न उत्कृष्ट ही कहलाने योग्य है; क्योंकि वह सबको व्यामोहमें ही डालती रहती है। अतः (विषयोंकी भाँति) वह भी निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली है। जैसे नदीसे असंख्य चञ्चल तरङ्गें प्रकट होती और वायुकी सहायतासे बढ़ती रहती हैं,–उसी प्रकार इस श्री अथवा सम्पत्तिसे बहुत-सी चिन्तारूपिणी पुत्रियाँ उत्पन्न होती हैं और विविध दुश्चेष्टाओंद्वारा वृद्धिको प्राप्त होती रहती हैं। यह सम्पत्ति शास्त्रोक्त सदाचारसे रहित पुरुषको पाकर इधर-उधर दौड़ती रहती है, कहीं एक जगह पैर जमाकर स्थिर नहीं रहती। यह मूढ़ सम्पत्ति किसी गुणवान् पुरुषके द्वारा बड़े दुःखसे उपार्जित होनेपर भी प्रायः उसके उपभोगमें नहीं आती और राजाओंकी प्रकृतिके समान (श्रेष्ठ पुरुषकी उपेक्षा करके भी) गुण-अवगुणका विचार किये बिना ही जो कोई भी अपने पास रहता है, उसीका अवलम्बन कर लेती है। लोग तभीतक अपने और पराये जनोंके प्रति शीतल-मृदुल (दया, उदारता और स्नेह आदिसे सम्पन्न) बने रहते हैं जबतक कि वे प्रबल