संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करना * ६२५
सुनकर मैं यह जान सकूँगा कि दिगन्तोंमें कैसी घटना घटित हुई है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर द्वारपालने सेनापतिको तत्काल भीतर भेजा। राजाने देखा, उत्तर दिशाके नायक सामने खड़े होकर मुझे प्रणाम कर रहे हैं। इनका सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया है। प्रत्येक अङ्गमें बाण धँसे हुए हैं, जोर-जोरसे साँस चल रही है, मुँहसे खून निकल रहा है, निर्बल होनेपर ही ये शत्रुसे पराजित हुए हैं। सेनापतिने लगातार साँस लेते हुए भी धैर्यपूर्वक अपने शरीरकी व्यथाको सहन करके महाराजको प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
सेनाध्यक्ष बोले—देव ! आपके तीन दिशाओंके सामन्त बहुत बड़ी सेनाके साथ मानो आपकी आज्ञासे ही यमराजको जीतनेके लिये यमलोकको चले गये। तदनन्तर उनके देशोंकी रक्षा आदि करनेमें मुझे असमर्थ समझकर बहुत-से भूपाल मेरा पीछा करते हुए बलपूर्वक यहाँ आ पहुँचे हैं। महाराजके इस राज्यमें शत्रुओंकी बहुत बड़ी सेना आ गयी है। अब जो कर्तव्य प्राप्त है, उसे कीजिये। शत्रुओंको मार भगाइये। महाराजके लिये किसीपर भी विजय पाना कठिन नहीं है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत होनेसे अत्यन्त पीड़ित हुए उत्तर दिशाके सेनानायक जिस समय उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उसी समय सहसा दूसरा पुरुष भीतर आकर यों बोला—'नरेश्वर ! इस मण्डलके बहुत-से लोग पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहे हैं। चारों ओर शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाएँ खड़ी हैं। जैसे लोकालोक पर्वतके तट सारी वसुधाको घेरे हुए हैं, वैसे ही हमारे शत्रुओंने इस भूमिको घेर लिया है। उनके हाथोंमें चक्र, गदा, प्रास और भालोंके समूह चमक रहे हैं। पताकाओं, अस्त्र-शस्त्रों, अन्य चपल सामग्रियोंसे तथा योद्धाओंसे युक्त रथ इधर-उधर दौड़ रहे हैं। वे उड़नेवाले त्रिपुरसमूहोंके समान जान पड़ते हैं।'
यों कहकर प्रणाम करके वह पुरुष तुरंत लौट गया, मानो समुद्रकी लहर कोलाहल करके शान्त हो गयी हो। राजाके महलमें खलबली मच गयी। उसकी दशा प्रचण्ड आँधीसे व्याप्त हुए विशाल वनके समान हो गयी थी। मन्त्री, राजा, योद्धा, आज्ञाकारी सेवक, हाथी, घोड़े, रथ, स्त्रियाँ, परिचारकवर्ग और नागरिकोंके समुदाय सभी घबराये हुए थे। सबने भयके कारण आत्मरक्षाके लिये अपने हाथोंमें हथियार उठा लिये थे।
(सर्ग १०८)
राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करके चार दिव्यरूपोंमें प्रकट होना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीचमें जिनके अन्तरिक्ष लोकपर दैत्योंने आक्रमण किया हो, उन देवराज, इन्द्रके समीप जैसे मुनि आते हैं, उसी प्रकार राजा विपश्चित्के पास उनके अन्य सब मन्त्री आये और इस प्रकार बोले—'देव ! हमने यही निर्णय किया है कि अब हमारे शत्रु साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंद्वारा वशमें किये जाने योग्य नहीं रह गये हैं। इसलिये उनपर दण्डका ही प्रयोग कीजिये।
राजा बोले—अच्छा, अब आपलोग शीघ्र ही युद्धके लिये जाइये और नगररक्षा एवं व्यूहरचना (मोर्चाबंदी) की व्यवस्था कीजिये। मैं स्नान करके अग्निदेवका पूजन करनेके पश्चात् समराङ्गणमें आऊँगा।
ऐसा कहकर राजाने गङ्गाजलसे भरे हुए घड़ोंद्वारा स्नान किया। तत्पश्चात् वे अग्निशालामें गये। वहाँ शास्त्रीय विधिसे अग्निदेवका आदरपूर्वक पूजन करके उन्होंने इस प्रकार विचार किया—'मैं विजय प्रदान करनेवाले