संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२७
विपश्चित् इस तरह भागते हुए शत्रुओंकी सेनाका पीछा करते-करते बहुत दूर चले गये । सम्पूर्ण शक्तियोंसे परिपूर्ण एकमात्र चेतन परमेश्वरसे प्रेरित हो समान अभिप्रायवाले उन चारों वीरोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें विजय प्राप्त कर ली । जैसे नदियोंके प्रवाह समुद्रतक जाते हैं, वैसे ही उन्होंने समुद्रके किनारेतक शत्रुओंका पीछा किया । दूरतक बिना विश्राम किये चलते रहनेसे विपश्चित्के सैनिकोंके जीवन-निर्वाह और युद्ध आदिके सारे साधन प्रतिदिन छोटी-छोटी नदियोंके जलकी भाँति क्षीण होते गये । उनके शत्रुओंका भी यही हाल हुआ । प्रतिदिन दौड़ते हुए उनकी और शत्रुओंकी सारी सेनाएँ मुमुक्षुओंके पुण्य और पापकी भाँति निरन्तर नष्ट होने लगीं । जब सारे सैनिक नष्ट हो गये, तब उनके वे दिव्यास्त्र सफल होकर आकाशमें ही शान्त हो गये, जैसे जलाने योग्य ईंधन आदिका अभाव हो जानेपर आगकी ज्वालाएँ स्वयं ही बुझ जाती हैं । म्यानों, तरकसों तथा रथ, घोड़े, हाथी और वृक्षसमुदाय आदि स्थानोंमें पड़े हुए अस्त्र-शस्त्र सायंकाल घोंसलोंमें छिपकर नींद लेनेवाले पक्षियोंके समान निश्चेष्ट हो गये । उस समय शून्यातारूपी जलसे भरा हुआ निर्मल आकाश बढ़े हुए विस्तृत एकार्णवके समान जान पड़ता था । उसके अस्त्र-शस्त्ररूपी जल-जन्तु मानो शान्त होकर कीचड़में विलीन हो गये थे । बाणरूपी जलकणोंकी वर्षाके कारण फैला हुआ कुहरा वहाँसे हट गया था, चक्ररूपी सैकड़ों आवर्त अब नहीं उठते थे । वहाँ निर्मल सौम्यता विराज रही थी । बादलोंके वेगपूर्वक वर्षा करनेसे उत्तुङ्ग तरङ्गोंकी भाँति ऊँची-ऊँची जलधाराएँ शान्त हो चुकी थीं । नक्षत्ररूपी रत्नराशि अन्दर छिप गयी थी और सूर्यरूपी बड़वानल उसके एक देशमें विद्यमान था । सूर्य आदिके विस्तृत प्रकाशसे युक्त, गम्भीर एवं प्रभापूर्ण, धूलरहित वह स्वच्छ आकाश महात्माओंके रजोगुणरहित, आत्म-प्रकाशसे पूर्ण, गम्भीर एवं प्रसन्न मनकी भाँति शोभा पा रहा था । उन चारों विपश्चितोंने चारों समुद्रोंको आकाशके छोटे भाइयोंके समान देखा, जो विमल, विस्तृत एवं सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करके स्थित थे। ऊँची-ऊँची तरङ्गैं, जिनमें जल-जन्तु भी ऊपरको उठ जाते थे, इस तरह नीचे गिरती थीं, मानो आकाशके टुकड़े-टुकड़े होकर नीचे गिर रहे हों । अपनी उठती हुई तरङ्गोंद्वारा अगवानी-सी करते हुए क्षारसमुद्रके विशाल तटपर जब विपश्चित्की सेना पहुँची, तब उन्हें अपने सामने गगनचुम्बी पर्वतके शिखरपर भ्रमरोंके समान काली वनपङ्क्ति शोभा पाती दिखायी दी, जो इलायची, लौंग, मौलसिरी, आँवला, तमाल, हिंताल और ताड़के पत्तोंके ताण्डव-नृत्यसे विभक्त-सी जान पड़ती थी ।
( सर्ग ११०-११३ )
विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ, कुत्ते, कौए और कोकिल आदिको दिखाकर अन्योक्तियोंद्वारा विशेष अभिप्राय सूचित करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर वहाँ पार्श्ववर्ती मन्त्री आदिने उन चारों विपश्चितोंको उस समय भिन्न-भिन्न वन, वृक्ष, समुद्र, पर्वत, ग्राम, मेघ और वन-चर दिखाये ।
तत्पश्चात् उन अनुचरोंने कहा—देव ! देखिये, यहाँ युद्धमें लगे हुए सीमाप्रान्तके राजाओंके अस्त्र-शस्त्रोंकी राशियों चमचमा रही हैं और इनकी चतुरङ्गिणी सेनाएँ इधर-उधर विचर रही हैं। देखिये, देखिये, युद्धमें वीरोंद्वारा सम्मुख मारे गये सहस्रों वीरोंको विमानोंपर चढ़ा-चढ़ाकर स्वर्गीय अप्सराएँ उन विमानोंद्वारा आकाशमें लिये जा रही हैं । जो युद्धमें सामने आये हुए योद्धाको धर्मके अनुकूल चलते हुए योग्य¹ अवस्थामें वध करता है, वही शूरवीर
१. योग्य अवस्थासे तात्पर्य यह है कि यदि विपक्षी पैदल हो तो स्वयं भी उसके साथ पैदल ही लड़ा जाय अथवा उसे