भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

४० * अविवेकविशाखार्त्तः पुमानस्मीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अत्यन्त विकल है, किन्तु कहीं भी शान्तिको नहीं पाता।

भगवन् ! जैसे मृग गड्ढेमें गिरनेकी कोई चिन्ता न करके दूर-ही-दूर जानेकी इच्छासे प्रेरित हो बहुत दूरतक दौड़ लगाता रहता है, उसी प्रकार यह मन नरकके गर्तमें गिरनेकी परवा न करके भोग-रूपी आशासे बड़ी दूरतक चक्कर लगाता रहता है (भाँति-भाँतिके मनसूबे बाँधता रहता है)। जैसे पिंजरेमें बंद किया हुआ सिंह चिन्ताके कारण एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता, उसी तरह नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें अत्यन्त चञ्चल हुआ मन अपनी चञ्चल वृत्तिके कारण कहीं स्थिर नहीं रह पाता। जैसे हंस जलमें दूधको निकाल लेता है, वैसे ही स्नेहरूपी रसपर आरूढ हुआ यह मन भी इस शरीरसे उद्वेगशून्य समताके सुखका अपहरण कर लेता है। भगवन् ! मनरूपी ग्रह अग्निसे भी अधिक उष्ण है। इसके ऊपर चढ़ना पर्वतपर चढ़नेसे भी अधिक कठिन है तथा यह वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। उसको वशमें लाना बहुत ही कठिन है। जैसे मांसभक्षी पक्षी मांसपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार मन भी इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध होनेवाले विषयोंकी ओर दौड़ पड़ता है। परंतु जैसे बालक पहले तो खिलौनेकी ओर झपटता है, फिर उसे पाकर थोड़ी ही देरमें उससे मुँह मोड़ लेता है, उसी तरह यह मन प्राप्त हुए विषयमें क्षणभरमें ही विरक्त हो जाता है (और नये-नये विषयकी खोज करने लगता है)।

समुद्रको पी जाना, सुमेरु पर्वतको जड़से उखाड़ फेंकना तथा अग्निका ही आहार करना—ये महान् एवं दुःसाध्य कार्य हैं। परंतु चञ्चल चित्तको वशमें कर लेना इनसे भी महान् एवं कठिन कार्य है। सम्पूर्ण पदार्थोंका कारण चित्त ही है। जबतक चित्त है, तभीतक तीनों लोकोंकी सत्ता है, उसके क्षीण होते ही जगत् क्षीण हो जाता है। इसलिये इस चित्तरूपी रोगकी यत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये। मुने ! जैसे महान् पर्वतसे अनेकानेक वनों एवं काननोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार मनसे ये सैकड़ों सुख-दुःख पैदा हुए हैं—इसमें संशय नहीं है। अध्यात्मविषयक विवेकसे जब यह मन दुर्बल हो जाता है, तब ये सारे सुख-दुःख निश्चय ही पूर्णरूपसे गल जाते हैं—ऐसा मेरा विश्वास है। महान् मुमुक्षु पुरुष जिसके जीते जानेपर शम, दम, क्षमा, दया, समता, शान्ति, संतोष, सरलता आदि समस्त सद्गुणोंके स्वाधीन होनेकी आशा करते रहते हैं, उस शत्रुरूप चित्तको जीतनेके लिये मैं सब प्रकारसे उद्यत हुआ हूँ। अतएव जैसे चन्द्रमा मेघमालाका अभिनन्दन नहीं करता, उसी प्रकार मैं तीव्र वैराग्य-सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण जड़ और मलिन विलासवाली लक्ष्मीका अभिनन्दन नहीं करता। (सर्ग १५-१६)


तृष्णाकी निन्दा

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! चेतन जीवरूपी उद्यानमें हृदयरूपी अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण दुस्तर गुहामयी गर्तिका तड़ाग बनकर नाना प्रकारके दोषरूपी उल्लुओंकी उसमें निकासी हो उठती है। जैसे शरद् ऋतुके दिनोंमें अभिषिक्त तथा ओस-वायुके टकरानेसे गिरे हुए कादल पुञ्ज (चनेके वृन्द) की उज्ज्वल शोभासे सुशोभित चनेकी फलियाँ निश्चय ही अधिक विकासको प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार अनेक तरहके दुःखमय सन्तापोंसे प्रकट हुए अश्रुबिन्दुओंसे आर्द्र तथा निकटवर्ती सुवर्ण आदिकी अभिलाषाद्वारा उच्चण्ड हुई चिन्ता या तृष्णा अवश्य अधिकाधिक बढ़ने लगती है। जैसे समुद्रके भीतर

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 71, कुल 750 में से · BharatKosha