भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 82

वैराग्य-प्रकरण ] * स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण * ४९

लोगों ! तुम इसपर विश्वास न करो । जब-जब यौवन अपनी चरम सीमापर आरूढ़ हो जाता है, तब-तब संतापयुक्त कामनाएँ केवल विनाशके लिये ही बढ़ने या नृत्य करने लगती हैं। ये राग-द्वेषरूपी पिशाच तभीतक विशेषरूपसे नाचते फिरते हैं, जबतक कि यह यौवनरूपिणी रात्रि पूर्णरूपसे नष्ट नहीं हो जाती । जो महामुग्ध पुरुष मोहवश क्षणभङ्गुर यौवनसे हर्षको प्राप्त होता है, वह मनुष्य होता हुआ भी निरा पशु ही माना गया है । जो मनुष्य अभिमान या अज्ञानके कारण मदोन्मत्त यौवनावस्थाकी अभिलाषा करता है, उस दुर्बुद्धिको शीघ्र ही पश्चात्तापका भागी होना पड़ता है । साधो !

इस भूतपर वे ही पुरुष पूजनीय और महात्मा हैं, जो यौवनरूपी संकटसे सुखपूर्वक पार हो गये हैं । बड़े-बड़े मकरोंसे भरे हुए महासागरको सुखपूर्वक पार किया जा सकता है, किंतु विषय-चिन्तन आदि महातरङ्गोंके कारण उमड़े हुए और दुर्गुण दुराचाररूप अनेक दोषोंसे भरे हुए इस निन्दनीय यौवनके पार जाना बहुत ही कठिन है। ब्रह्मन् ! विनयसे अलंकृत, श्रेष्ठ पुरुषोंको आश्रय देनेवाला, करुणासे प्रकाशित तथा शम, दम, क्षमा, दया, शान्ति, संतोष, सरलता आदि विविध गुणोंसे युक्त उत्तम यौवन इस संसारमें उसी तरह दुर्लभ है, जैसे आकाशमें वन । (सर्ग २०)


स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! इधर केश हैं, इधर रक्त और मांस है, यही तो युवती स्त्रीका शरीर है। जिसका हृदय विवेकसे विशाल हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषको इस निन्दित नारी-शरीरसे क्या काम ? आदरणीय मुने ! बहुमूल्य वस्त्र और केसर-कस्तूरी आदिके लेपसे जिन्हें बारंबार सजाकर दुलराया गया था, समस्त देहधारियोंके उन्हीं अङ्गोंको किसी समय गीध और सियार आदि मांसाहारी जीव नोचते और घसीटते हैं । जिस स्तनमण्डलपर मेरु पर्वतके शिखरप्रान्तसे सोल्लास प्रवाहित होनेवाली गङ्गाजीके जलकी धाराके समान मोतियोंके हारकी शोभा देखी गयी थी, मृत्युके पश्चात् सम्पूर्ण दिशाओंकी श्मशान-भूमियोंमें नारीके उसी स्तनका कुत्ते अन्नके छोटे-से पिण्डकी भाँति आस्वादन करते हैं। जैसे वनमें चरनेवाले गदहे या ऊँटके अङ्ग रक्त-मांस और हड्डियोंसे सम्पन्न हैं, उसी प्रकार कामिनियोंके अङ्ग भी उन्हीं उपकरणोंसे युक्त हैं। फिर नारीके प्रति ही लोगोंका इतना आग्रह या आकर्षण क्यों है ?

मुने ! लोग केवल स्त्रीके शरीरमें जिस आपात-रमणीयताकी कल्पना करते हैं, मेरी मान्यताके अनुसार वह भी उसमें है नहीं । उसमें जो रमणीयताकी प्रतीति होती है, उसका एकमात्र कारण मोह ही है। मनमें विकार उत्पन्न करनेवाली मदिरामें और युवती स्त्रीमें क्या अन्तर है ? एक जहाँ मद (नशे) के द्वारा मनुष्यको प्रचुर उल्लास प्रदान करती है, वहाँ दूसरी कामका भाव जगाकर पुरुषके लिये आनन्ददायिनी बनती है (अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषके लिये दोनों ही सामान्यरूपसे त्याज्य हैं) । जैसे धूमको ही केशके रूपमें धारण करनेवाली प्रज्वलित अग्निशिखा, जो देखनेमें सुन्दर किंतु छूनेमें दुःसह है, तिनकोंको जला डालती है, उसी प्रकार केश और काजल धारण करनेवाली तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाली नारियाँ, जिनका स्पर्श परिणाममें दुःख देनेवाला है, पुरुषको वासनाकी आगसे जलाती रहती हैं।

जैसे विषकी लता सुन्दर फूलोंसे मनोहर लगती, नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित होती, भ्रमरोंकी क्रीडास्थली