संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य-प्रकरण ] * कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता * ५३
जी भरकर तृप्त करता है। जैसे बालक गीली मिट्टीको लेकर नाना प्रकारके खिलौने बनाते हैं, उसी प्रकार काल भी बारंबार चौदह भुवन, विभिन्न वन, लोक-लोकान्तर, जीव-समुदाय तथा उनके नाना प्रकारके आचार-विचारोंकी सृष्टिकरता है। उन आचार-विचारोंकी प्रवृत्ति सत्ययुग और त्रेतामें अचल तथा द्वापर और कलिमें चल होती है। इन सबकी सृष्टि करनेमें काल कभी थकता नहीं।
(सर्ग २३—२५)
कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महामुने ! जब जगत्में काल आदिके चरित्र ऐसे हैं, तब आप ही बताइये इस संसार-नामधारी प्रपञ्चमें मेरे-जैसे लोगोंकी क्या आस्था हो सकती है। मुने ! इन दैव (प्रारब्धकर्म) आदिके द्वारा की हुई सुख-दुःख आदिरूप प्रपञ्च-रचनाओंसे मोहित हुए हमलोग किसीके हाथ बिके हुए दासों तथा वनके मृगोंकी भाँति पराधीन हो रहे हैं। जैसे सर्प वायुको पीता है, उसी प्रकार यह क्रूर आचरण करनेवाला काल तरुण शरीरको बुढ़ापेमें पहुँचाकर समस्त प्राणि-समुदायको निरन्तर अपना ग्रास बनाता रहता है। काल निर्दयोंका राजा है। वह किसी भी आर्त प्राणीके ऊपर दया नहीं करता। सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाला उदार पुरुष तो इस संसारमें दुर्लभ हो गया है। मुने ! जगत्में जितनी भी प्राणियोंकी जातियाँ हैं, उन सबका वैभव अल्प एवं तुच्छ है तथा जितने भी भोगके स्थान हैं, वे सभी भयंकर और परिणाममें दुरन्त दुःखकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं। प्राणियोंकी आयु अत्यन्त चपल (अस्थिर) है, मृत्यु बहुत ही निर्दय है। जवानी भी अधिक चञ्चल होती है और बाल्यावस्था मोहमें ही बीत जाती है । संसारी मनुष्य गाने-बजानेकी कलाके रस (अथवा विषया-नुसंधान) से कलङ्कित हैं । बन्धु-बान्धव संसारमें बाँधनेके लिये रस्सीके समान हैं । भोग इस जगत्के महान् रोग हैं तथा सुख आदिकी तृष्णाएँ मृगतृष्णाके समान हैं । बिना जीती हुई इन्द्रियाँ ही शत्रु हैं । सत्यस्वरूप आत्मा असत्य-सा हो गया अर्थात् जीवात्मा अज्ञानके कारण देहको ही अपना स्वरूप मानने लग गया । बिना जीता हुआ मन बन्धनका हेतु होनेसे आत्माका शत्रु है एवं अज्ञानवश यह जीवात्मा स्वयं ही अपने-आपपर उस मनके द्वारा प्रहार करता है । अहंकार ही कलङ्कका कारण है । बुद्धियाँ अत्यन्त कोमल (आत्म-निष्ठासे रहित) हैं। क्रियाएँ शास्त्रविरुद्ध होनेसे दुःखरूप फल देनेवाली हैं और लीलाएँ (शरीर और मनकी चेष्टाएँ) स्त्रीकी प्राप्तिमें ही केन्द्रित हैं, केवल स्त्रियाँ ही उनका विषय हो गयी हैं । इच्छाएँ विषयोंमें ही शोभा पाती हैं—वे भोगोंकी ओर ही दौड़ती हैं । परमात्म-स्फूर्तिरूप चमत्कार नष्ट हो गये हैं । स्त्रियाँ दोषोंकी सेनाएँ हैं तथा सम्पूर्ण विषय-रस वास्तवमें नीरस हैं ।
महात्मन् ! दूषित बुद्धिने सबके अन्तःकरणको व्याकुल कर रक्खा है। अज्ञानके कारण सभी सन्तप्त हो रहे हैं । रागरूपी रोग दिनोंदिन बढ़ रहा है और वैराग्य दुर्लभ हो रहा है । आत्मदर्शनकी शक्ति रजोगुणसे नष्ट हो गयी है । अतः सत्त्वगुण नहीं प्राप्त होता, केवल तमोगुण बढ़ रहा है। इसलिये तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्मा) अत्यन्त दूर है । जीवन अस्थिर हो गया है। मृत्यु जल्दी ही आनेके लिये उत्सुक है । धैर्य शिथिल हो गया है और तुच्छ विषय-भोगोंके प्रति लोगोंकी आसक्ति प्रतिदिन बढ़ रही है । बुद्धि मूढ़तासे मलिन हो गयी है । शरीरका अन्तिम परिणाम एकमात्र पतन (विनाश) ही है । देहमें जरावस्था प्रज्वलित हो उठी है और पापकी ही बारंबार स्फुरणा होती है । जवानी भागी जा रही है । सत्सङ्ग दुर्लभ हो गया है।