भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ६१


आश्रय लेकर आप-जैसे पापरहित महामना महापुरुष इस जगत्में जीवन्मुक्त होकर विचरते हैं ? जिसे मोहरूपी मतवाले हाथीने मथ डाला है, जिसके भीतर काम आदि दोषोंकी कीचड़ भरी पड़ी है, वह प्रज्ञारूपी महान् सरोवर किस उपायसे अत्यन्त निर्मल हो जाता है ? जैसे कमलके पत्तेसे जलका लगाव नहीं होता, उसी प्रकार प्रवाहरूपसे बने रहनेवाले इस संसारमें समस्त व्यवहारोंका निर्वाह करता हुआ भी मनुष्य बन्धनमें न पड़े—इसका क्या उपाय है ? सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्माके समान तथा इस समस्त भोग-प्रपञ्चको तिनकेके समान समझनेवाला और मनकी कामादि वृत्तियोंका स्पर्श न करनेवाला मनुष्य कैसे श्रेष्ठ पदको प्राप्त हो सकता है ? जिसने संसाररूपी महासागरको पार कर लिया हो, ऐसा कौन-सा महापुरुष है, जिसके चरित्रका अनुसरण करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता ? वह प्राप्त करने योग्य कल्याण और फल क्या है ? इस विषय-संसारमें (इसे पार करनेके लिये) कैसे व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! मुझे तत्त्वका कुछ उपदेश दीजिये, जिससे मैं ब्रह्माजीके द्वारा रचित इस अव्यवस्थित जगत्का पूर्वापर (आदि-अन्त) समझ सकूँ । इस संसारमें ग्रहण करने योग्य वस्तु क्या है ? त्याज्य वस्तु क्या है ? तथा इन दोनोंसे भिन्न अग्राह्य एवं अत्याज्य वस्तु क्या है ? मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त किस प्रकार पर्वतके समान स्थिरता एवं शान्तिको प्राप्त करे ? किस पावन मन्त्रसे सैकड़ों क्लेशोंकी सृष्टि करनेवाला यह दोष-युक्त संसाररूपी विसूचिका (हैजा) का रोग अनायास शान्त हो सकता है ? महात्मन् ! जैसे वनमें कुत्ते विभिन्न जन्तुओंके अधमरे शरीरको पीड़ित करते रहते हैं, उसी तरह नाना प्रकारके संशय मर्यों कुछ आनन्दमय ब्रह्म-पदमें आत्यन्तिक निष्ठासे रहित पुरुषको सदा कष्ट देते रहते हैं।

मुनीश्वर ! ऐसा कौन-सा उपाय है, क्या गति है, कौन-सा चिन्तन है, क्या आश्रय है तथा कौन-सा साधन है, जिसका अवलम्बन करनेसे यह जीवनरूपी वन भविष्यमें अमङ्गलकारी न हो ? भगवन् ! इस पृथ्वीपर, स्वर्गमें अथवा देव-समाजमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुच्छ होनेपर भी आप-जैसे परम बुद्धिमान् महात्मा रमणीय न बना दें। यह नश्वर संसार निरन्तर दुःखोंसे परिपूर्ण और नीरस है। कृपया यह बताइये कि यह किस उपायसे अज्ञानके निवारणपूर्वक परमानन्दरूप उत्तम स्वादसे युक्त हो जाता है। मुने ! यह मनरूपी चन्द्रमा कामसे कलङ्कित हो रहा है। इसे किस साधन एवं विधिसे धोया जाय कि उससे अत्यन्त निर्मल एवं परम आह्लादमयी दिव्य चाँदनीका उदय हो। जिसे संसारकी गतिका अनुभव है और जिसने निष्कामभावके द्वारा दृष्ट एवं अदृष्ट कर्मफलोंका विनाश कर दिया है, ऐसे किस महापुरुषकी भाँति हमें इस संसाररूपी वनकी गलियोंमें विचरते समय व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! किस उपायका आश्रय लिया जाय, जिससे संसाररूपी वनमें विचरनेवाले जीवको राग-द्वेषरूपी बड़े-बड़े दोष तथा भोग-समूह एवं ऐश्वर्यरूपी हिंसक जन्तु कष्ट न दे सकें ! मुनिश्रेष्ठ ! तीनों लोकोंमें मनकी जो मननशालिनी सत्ता (विषय-चिन्तनरूप अस्तित्व) है, उसे किसी साधनरूप युक्तिके बिना नष्ट नहीं किया जा सकता। अतः आप उस उत्तम युक्तिका पूर्णरूपसे उपदेश कीजिये। अथवा जिसका अवलम्बन करनेसे लोकव्यवहारमें तत्पर रहनेपर भी मुझे दुःख प्राप्त न हो सके, उस व्यवहार-सम्बन्धिनी उत्तम युक्तिका प्रतिपादन कीजिये। किस उत्तम चित्तवाले महापुरुषने पहले युक्तिके द्वारा मोहका निवारण किया था ? उसने किस प्रकार और क्या किया था; जिससे उसका मन परम पवित्र होकर शान्तिको प्राप्त हो गया ? भगवन् ! मोहकी निवृत्तिके लिये आप-जैसा, जो कुछ भी जानते हैं, उसका उसी रूपमें मुझे उपदेश कीजिये। वह कौन-सा साधन है, जिसका आश्रय लेनेसे अनेक श्रेष्ठ पुरुष दुःखरहित स्थिति (कल्याण) को प्राप्त हो गये हैं ?

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जैसे मोर महान्