संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदारम्भप्रकरणम् १०९ पूर्वाभिमुख बैठके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान आचार्य के साथ करके— 'अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहं भो भवन्तमभिवादये ॥' ऐसा वाक्य बोलके आचार्य का वन्दन करे और आचार्य— 'आयुष्मान् विद्यावान् भव सौम्य ॥' ऐसा आशीर्वाद देके, पश्चात् होम से बचे हुए हविष्य अन्न और दूसरे भी सुन्दर मिष्टान्न का भोजन आचार्य के साथ अर्थात् पृथक्-पृथक् बैठके करें। तत्पश्चात् हस्त-मुख प्रक्षालन करके, जो निमन्त्रण से संस्कार में आये हों, उन्हें यथायोग्य भोजन करा, तत्पश्चात् स्त्रियों को स्त्री और पुरुषों को पुरुष प्रीतिपूर्वक विदा करें और सब जने बालक को निम्नलिखित— 'हे बालक ! त्वमीश्वरकृपया विद्वान् शरीरात्मबलयुक्तः कुशली वीर्यवान् अरोगः सर्वा विद्या अधीत्याऽस्मान् दिदृक्षुः सन्नागम्याः ॥' ऐसा आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को चले जाएँ। तत्पश्चात् ब्रह्मचारी तीन दिन तक भूमि में शयन, प्रातःसायं पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र से वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा कर, (अग्नये समिध०) इस मन्त्र से समिधा होम और पृष्ठ १०१ में लिखे प्रमाणे मुख आदि अङ्गस्पर्श आचार्य करावे तथा तीन दिन तक पृष्ठ १०८ में लिखे प्रमाणे (सदसस्पति०) इत्यादि चार स्थालीपाक की आहुति पूर्वोक्त रीति से ब्रह्मचारी के हाथ से करवावे और तीन दिन तक क्षार- लवणरहित पदार्थ का भोजन ब्रह्मचारी किया करे। तत्पश्चात् पाठशाला में जाके गुरु के समीप विद्याभ्यास करने के समय की प्रतिज्ञा करे तथा आचार्य भी करे।