संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदारम्भप्रकरणम् ११३ तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ७ ॥ अर्थ:—जब बालक को पाँच वर्ष की आयु तक माता, पाँच ये आठ तक पिता, आठ से अड़तालीस, चवालीस, चालीस, छत्तीस, तीस तक अथवा पच्चीस वर्ष तक, तथा कन्या को आठ से चौबीस, बाईस, बीस, अठारह, अथवा सोलह वर्ष तक आचार्य की शिक्षा प्राप्त हो, तभी वे विद्यावान् होकर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के व्यवहारों में अतिचतुर होते हैं ॥ १ ॥ इस मनुष्य-देह को यज्ञ अर्थात् इसे अच्छे प्रकार आयु, बल आदि से सम्पन्न करने के लिए छोटे-से-छोटा पक्ष यह है कि पुरुष चौबीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य और सोलह वर्ष तक कन्या यथावत् पूर्ण ब्रह्मचर्याश्रम करे। जैसे चौबीस अक्षर का गायत्री छन्द होता है, वैसे करे, वह प्रातःसवन कहाता है। जिससे इस मनुष्य-देह के मध्य वसुरूप प्राण प्राप्त होते हैं, जो बलवान् होकर सब शुभ गुणों को शरीर, आत्मा और मन के बीच वास कराते हैं ॥ २ ॥ जो कोई इस पच्चीस वर्ष के आयु से पूर्व ब्रह्मचारी को विवाह वा विषयभोग करने का उपदेश करे, उसको वह ब्रह्मचारी यह उत्तर देवे कि—देख ! यदि मेरे प्राण, मन और इन्द्रिय पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य से बलवान् न हुए तो मध्यम सवन जोकि आगे चवालीस वर्ष तक का ब्रह्मचर्य कहा है, उसको पूर्ण करने के लिए मुझमें सामर्थ्य न हो सकेगा। प्रथम कोटि का ब्रह्मचर्य मध्यम कोटि के ब्रह्मचर्य को सिद्ध करता है, इसलिए क्या