संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ संस्कारविधिः ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्त- पश्शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैत- दुपास्वैतत्तपः॥ २॥ —तैत्तिरी० प्रपा० १०। अनु० ८॥ अर्थः—हे शिष्य! जो आनन्दित, पापरहित, अर्थात् अन्याय, अधर्माचरणरहित, न्याय-धर्माचरणसहित कर्म हैं, उन्हीं का सेवन तू किया करना, इनसे विरुद्ध अधर्माचरण कभी मत करना। हे शिष्य! जो तेरे माता-पिता, आचार्य आदि हम लोगों के अच्छे, धर्मयुक्त, उत्तम कर्म हैं, उन्हीं का आचरण तू कर और जो हमारे दुष्ट कर्म हों, उनका आचरण कभी मत कर। हे ब्रह्मचारिन्! जो हमारे मध्य में धर्मात्मा, श्रेष्ठ ब्रह्मवित् विद्वान् हैं, उन्हीं के समीप बैठना, संग करना और उन्हीं का विश्वास किया कर॥ १॥ हे शिष्य! तू जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य बोलना, वेदादि सत्यशास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर। जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म—परमात्मा की उपासना कर। ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ २॥ ऋतञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्या०। दमश्च स्वाध्या०। शमश्च स्वाध्या०। अग्नयश्च स्वाध्या०। अग्निहोत्रं च स्वाध्या०। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ ३॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ९॥ अर्थः—हे ब्रह्मचारिन्! तू सत्य धारण कर, पढ़ और पढ़ाया कर और सत्योपदेश करना कभी मत छोड़, सदा सत्य बोल, पढ़ और पढ़ाया कर। हर्ष-शोकादि छोड़, प्राणायाम-योगाभ्यास