संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १४१ काममाममरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि। न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित्॥२॥ त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती। ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम्॥३॥ अर्थ:-यदि माता-पिता कन्या का विवाह करना चाहें तो अति उत्कृष्ट शुभगुण-कर्म-स्वभाववाले, कन्या के सदृश रूपलावण्यादि गुणयुक्त वर ही को चाहें वह कन्या माता की छह पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या देना अन्य को कभी न देना कि जिससे दोनों अति प्रसन्न होकर गृहाश्रम की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति करें॥१॥ चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में बिना विवाह के बैठी भी रहे, परन्तु गुणहीन असदृश, दुष्ट पुरुष के साथ कन्या का विवाह कभी न करे और वर-कन्या भी अपने-आप स्वसदृश के साथ ही विवाह करें॥२॥ जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने के दिन से तीन वर्ष को छोड़के चौथे वर्ष में विवाह करे॥३॥ प्रश्न- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।' इत्यादि श्लोकों की क्या गति होगी? उत्तर- इन श्लोकों और इनके माननेवालों की दुर्गति, अर्थात् जो इन श्लोकों की रीति से बाल्यावस्था में अपने सन्तानों का विवाह कर-करा, उनको नष्ट-भ्रष्ट, रोगी, अल्पायु करते हैं, वे अपने कुल का जानो सत्यानाश कर रहे हैं। इसलिए यदि शीघ्र विवाह करें तो वेदारम्भ में लिखे हुए सोलह वर्ष से न्यून कन्या और पच्चीस वर्ष से न्यून पुरुष का विवाह कभी न करें- करावें। इसके आगे जितना अधिक ब्रह्मचर्य रक्खेंगे, उतना ही उनको आनन्द अधिक होगा। प्रश्न-विवाह निकटवासियों से अथवा दूरवासियों से