संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
DevanagariHindipublished318 पृष्ठ
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विवाहप्रकरणम् १५७ ओं यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा। हिरण्यपर्णो वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु* असौ॥ इस मन्त्र को बोलके, उसको लेके घर के बाहर मण्डपस्थान में कुण्ड के समीप हाथ पकड़े हुए वधू तथा वर दोनों आवें और वर निम्न दो मन्त्रों को बोले— ओं भूर्भुवः॒ स्वः॑। अघोर॑च॒क्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसूर्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ∞ ॥
- (असौ) इस पद के स्थान में कन्या का नाम उच्चारण करना। हे वरानने वा हे वरानन! (यत्) जो तू (मनसा) अपनी इच्छा से मुझको जैसे (पवमानः) पवित्र वायु (वा) जैसे (हिरण्यपर्णो वैकर्णः) तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य (दूरम्) दूरस्थ पदार्थों और (दिशोऽनु) दिशाओं को प्राप्त होता है, वैसे तू प्रेमपूर्वक अपनी इच्छा से मुझको प्राप्त होती वा होता है, उस (त्वा) तुझको (सः) वह परमेश्वर (मन्मनसाम्) मेरे मन के अनुकूल (करोतु) करे, और हे (वीर) जो आप मन से मुझको (ऐषि) प्राप्त होते हो उस आपको जगदीश्वर मेरे मन के अनुकूल सदा रक्खे ॥ २॥ ∞ हे वरानने (अपतिघ्नि) पति से विरोध न करनेहारी तू जिसके (ओम्) अर्थात् रक्षा करनेवाला (भूः) प्राणदाता (भुवः) सब दुःखों को दूर करनेहारा (स्वः) सुखस्वरूप और सब सुखों के दाता आदि नाम हैं, उस परमात्मा की कृपा और अपने उत्तम पुरुषार्थ से (अघोरचक्षुः) प्रियदृष्टि (एधि) हो, (शिवा) मंगल करनेहारी (पशुभ्यः) सब पशुओं को सुखदाता, (सुमनाः) पवित्रान्तःकरणयुक्त, प्रसन्नचित्त, (सुवर्चाः) सुन्दर शुभ, गुण, कर्म, स्वभाव और विद्या से सुप्रकाशित, (वीरसूः) उत्तम वीर पुरुषों