संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १६५ ओं सुगन्नु पन्थां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मध्ये ह्यजरन्नऽ आयुः। अपैतु मृत्युरमृतं म आगाद् वैवस्वतो नोऽअभयं कृणोतु स्वाहा ॥ इदं वैवस्वताय—इदन्न मम ॥४॥ ओं परं मृत्योऽअनु परेहि पन्थां यत्र नोऽअन्य इतरो देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजा ँ रीरिषो मोत वीरान्स्वाहा ॥ इदं मृत्यवे—इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं द्यौस्ते पृष्ठ ँ रक्षतु वायुरूरू अश्विनौ च। स्तनन्धयस्ते पुत्रान्सविताभिरक्षत्वावाससः परिधानाद् बृहस्पतिर्विश्वे देवा अभिरक्षन्तु पश्चात्स्वाहा ॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं मा ते गृहेषु निशि घोष उत्थादन्यत्र त्वद् रुदत्यः संविशन्तु मा त्व ँ रुदत्युरऽआवधिष्ठा जीवपत्नी पतिलोके विराज पश्यन्ती प्रजा ँ सुमनस्यमाना ँ स्वाहा ॥ इदमग्नये— इदन्न मम ॥ ७ ॥ ओम् अप्रजस्यं पौत्रमर्त्यपाप्मानमुत वाऽअघम्। शीर्ष्णः स्रजमिवोन्मुच्य द्विषद्भ्यः प्रतिमुञ्चामि पाश ँ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ८ ॥ इन प्रत्येक मन्त्रों से एक-एक आहुति करके आठ आज्याहुति दीजिए। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से चार आज्याहुति दीजिए। ऐसे होम करके वर आसन से उठ, पूर्वाभिमुख बैठी वधू के सम्मुख पश्चिमाभिमुख खड़ा रहकर अपने वामहस्त से वधू का दाहिना हाथ चत्ता धरके ऊपर को उचाना और अपने दक्षिण हाथ से वधू की उठाई हुई दक्षिण हस्ताञ्जलि को अंगुष्ठसहित चत्ती ग्रहण करके, वर—