भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

१८६ संस्कारविधिः ओं स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव॒ सम्रा॑ज्ञी॒ श्व॒श्र्वां भव॑। नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव॒ सम्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै—इदन्न मम॥४॥ इन चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक करके चार आज्याहुति देके, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् होमाहुति एक, व्याहृति आज्याहुति चार और प्राजापत्याहुति एक, ये सब मिलके छह आज्याहुति देकर— सम॑ञ्जन्तु विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ। सं मा॑त॒रिश्व॒ सं धा॒ता समु॑ दे॒ष्ट्री द॑धातु नौ**॥ इस मन्त्र को बोलके दोनों दधिप्राशन करें। तत्पश्चात्— अहं भो अभिवादयामि ¶ ॥

  • हे वरानने! तू (श्वशुरे) मेरे पिता जोकि तेरा श्वशुर है, उसमें प्रीति करके (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान, चक्रवर्ती राजा की राणी के समान पक्षपात छोड़के प्रवृत्त (भव) हो। (श्वश्र्वाम्) मेरी माता जोकि तेरी सासु है, उसमें प्रेमयुक्त होके उसी की आज्ञा में (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान (भव) रहा कर। (ननान्दरि) जो मेरी बहिन और तेरी ननन्द है, उसमें भी (सम्राज्ञी) प्रीति से प्रकाशमान (अधि भव) अधिकारयुक्त हो, अर्थात् सबसे अविरोधपूर्वक प्रीति से बर्त्ता कर॥४॥ ** इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ १५६ में लिखित समझ लेना। ∂ इससे उत्तम 'नमस्ते' यह वेदोक्त वाक्य अभिवादन के लिए नित्यप्रति स्त्री-पुरुष, पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्य आदि के लिए है। प्रातः-सायं अपूर्व समागम में जब-जब मिलें तब-तब इसी वाक्य से परस्पर वन्दन करें।
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक) · पृष्ठ 190, कुल 318 में से · BharatKosha