संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २१७ इन तीन मन्त्रों में से एक-एक से एक-एक आचमन कर, दोनों हाथ धो, कान, आँख, नासिका आदि का शुद्ध जल से स्पर्श करके, शुद्ध देश, पवित्रासन पर जिधर की ओर का वायु हो उधर को मुख करके, नाभि के नीचे से मूलेन्द्रिय को ऊपर संकोच करके हृदय के वायु को बल से बाहर निकालके यथाशक्ति रोके। पश्चात् धीरे-धीरे भीतर लेके भीतर थोड़ा- सा रोके। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार कम-से-कम तीन प्राणायाम करे। नासिका को हाथ से न पकड़े। इस समय परमेश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना हृदय में करके— ओं शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः॥ —यजुः अ० ३६ मं० ३॥ इस मन्त्र को एक बार पढ़के तीन आचमन करे। पश्चात् पात्र में से मध्यमा, अनामिका अंगुलियों से जलस्पर्श करके प्रथम दक्षिण और पश्चात् वाम निम्नलिखित मन्त्रों से स्पर्श करे— ओं वाक् वाक्॥ इस मन्त्र से मुख का दक्षिण और वाम पार्श्व। ओं प्राणः प्राणः॥ इससे दक्षिण और वाम नासिका के छिद्र। ओं चक्षुश्चक्षुः॥ इससे दक्षिण और वाम नेत्र। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्॥ इससे दक्षिण और वाम श्रोत्र। ओं नाभिः॥ इससे नाभि। ओं हृदयम्॥ इससे हृदय। ओं कण्ठः॥ इससे कण्ठ। ओं शिरः॥ इससे मस्तक। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्॥ इससे दोनों भुजाओं के मूल स्कन्ध और— ओं करतलकरपृष्ठे॥ इससे दोनों हाथों के ऊपर-तले स्पर्श करके, निम्नलिखित मन्त्रों से मार्जन करे— ओं भूः पुनातु शिरसि॥ इस मन्त्र से शिर पर।