संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० संस्कारविधिः ऋग्वेदविद् यजुर्विच्च सामवेदविदेव च। त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये॥५॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः। स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥६॥ अर्थ:—वैसे शिष्ट न्यून-से-न्यून दश पुरुषों की सभा होवे, अथवा बड़े विद्वान् तीनों की भी सभा हो सकती है। जो सभा से धर्म-कर्म निश्चित हों, उनका भी आचरण सब लोग करें॥३॥ • उन दशों में इस प्रकार के विद्वान् होवें—तीन वेदों के विद्वान्, चौथा हेतुक, अर्थात् कारण-अकारण का ज्ञाता, पाँचवाँ तर्की= न्यायशास्त्रवित्, छठा निरुक्त का जाननेवाला, सातवाँ धर्मशास्त्रवित्, आठवाँ ब्रह्मचारी, नववाँ गृहस्थ और दशवाँ वानप्रस्थ—इन महात्माओं की सभा होवे॥४॥ तथा ऋग्वेदवित्, यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों की भी सभा धर्मसंशय, अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिए होनी चाहिए और जितने सभा में अधिक पुरुष हों, उतनी ही उत्तमता है॥५॥ द्विजों में उत्तम, अर्थात् चतुर्थाश्रमी संन्यासी अकेला भी जिस धर्मव्यवहार के करने का निश्चय करे, वही कर्त्तव्य परमधर्म समझना, किन्तु अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों और करोड़ों पुरुषों का कहा हुआ धर्मव्यवहार कभी न मानना चाहिए, किन्तु धर्मात्मा विद्वानों और विशेष परमविद्वान् संन्यासी का वेदादि प्रमाणों से कहा हुआ धर्म सबको मानने योग्य है॥६॥ यदि सभा में मतभेद हो तो बहुपक्षानुसार मानना और समपक्ष में उत्तमों की बात स्वीकार करनी और दोनों पक्षवाले बराबर उत्तम हों तो वहाँ संन्यासियों की सम्मति लेनी। जिधर पक्षपातरहित सर्वहितैषी संन्यासियों की सम्मति होवे, वही उत्तम