संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २५५ सह॒ नाव॑वतु सह॒ नौ॑ भुनक्तु सह॒ वीर्यं॑ करवावहै। तेज॒स्वि नावधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषावहै॑ । ओं शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ ३ ॥ —तै० आर० अष्टमप्रपाठकः। प्रथमानुवाकः ॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! तुमको मैं ईश्वर आज्ञा देता हूँ कि (यथा) जैसे (पूर्वे) प्रथम अधीतविद्या, योगाभ्यासी, (संजानानाः) सम्यक् जाननेवाले, (देवाः) विद्वान् लोग मिलके (भागम्) सत्य-असत्य का निर्णय करके असत्य को छोड़ सत्य की (उपासते) उपासना करते हैं, वैसे (सं जानताम्) आत्मा से धर्माऽधर्म, प्रियाऽप्रिय को सम्यक् जाननेवाले (वः) तुम्हारे (मनांसि) मन एक-दूसरे से अविरोधी होकर एक पूर्वोक्त धर्म में सम्मत होवें और तुम उसी धर्म को (संगच्छध्वम्) सम्यक् मिलके प्राप्त होओ, जिसमें तुम्हारी एक सम्मति होती है और विरुद्धवाद, अधर्म को छोड़के (संवदध्वम्) सम्यक् संवाद प्रश्नोत्तर प्रीति से करके एक-दूसरे की उन्नति किया करो ॥ १ ॥ (प्रजापतिः) सकल सृष्टि की उत्पत्ति और पालन करनेवाला, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, न्यायकारी, अद्वितीय स्वामी परमात्मा (सत्यानृते) सत्य और अनृत (रूपे) भिन्न-भिन्न स्वरूपवाले धर्म-अधर्म को (दृष्ट्वा) अपनी सर्वज्ञता से यथावत् देखके (व्याकरोत्) भिन्न-भिन्न निश्चित करता है। (अनृते) मिथ्या- भाषणादि अधर्म में (अश्रद्धाम्) अप्रीति को और (प्रजापतिः) वही परमात्मा (सत्ये) सत्यभाषणादिलक्षणयुक्त न्याय, पक्षपातरहित धर्म में तुम्हारी (श्रद्धाम्) प्रीति को (अदधात्) धारण कराता है, वैसा ही तुम करो ॥ २ ॥ हम स्त्री-पुरुष, सेवक-स्वामी, मित्र-मित्र, पिता-पुत्रादि (सह) मिलके (नौ) हम दोनों प्रीति से (अवतु) एक-दूसरे की रक्षा किया करें और (सह) प्रीति से मिलके एक-दूसरे