संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २७९ ओं स्वाहा मनोवाक्कायकर्माणि मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ ११ ॥ अव्यक्तभावैरहङ्कारैर्ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १२ ॥ आत्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १३ ॥ अन्तरात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १४ ॥ परमात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा* ॥ १५ ॥ इन १५ मन्त्रों में से एक-एक करके भात की आहुति देनी। पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से ३५ घृताहुति देवें— ओमग्नये स्वाहा ॥ १६ ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ १७ ॥ ओं ध्रुवाय भूमाय स्वाहा ॥ १८ ॥ ओं ध्रुवक्षितये स्वाहा ॥ १९ ॥ ओमच्युतक्षितये स्वाहा ॥ २० ॥ ओमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ २१ ॥ ओं धर्माय स्वाहा ॥ २२ ॥ ओमधर्माय स्वाहा ॥ २३ ॥
- (प्राणापान) इत्यादि से लेके (परमात्मा मे शुध्यताम्) इत्यन्त मन्त्रों से संन्यासी के लिए उपदेश है, अर्थात् जो संन्यासाश्रम ग्रहण करे वह धर्माचरण, सत्योपदेश, योगाभ्यास, शम, दम, शान्ति, सुशीलतादि, विद्या-विज्ञानादि शुभ, गुण, कर्म, स्वभावों से सहित होकर, परमात्मा को अपना सहायक मानकर, अत्यन्त पुरुषार्थ से शरीर प्राण, मन, इन्द्रियादि को अशुद्ध व्यवहार से हटा शुद्ध व्यवहार में चलाके, पक्षपात कपट अधर्म व्यवहारों को छोड़, अन्य के दोष पढ़ाने और उपदेश से छुड़ाकर, स्वयं आनन्दित होके, सब मनुष्यों को आनन्द पहुँचाता रहे।