संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ संस्कारविधिः (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिल, पक्षपातसहित (एनः) अपराध, पाप-कर्म को (युयोधि) दूर रखिए और इस अधर्माचरण से हमें सदा दूर रखिए। इसीलिए (ते) आप ही की (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार (नमउक्तिम्) नमस्कारपूर्वक प्रशंसा को नित्य (विधेम) किया करें॥२॥ (यः) जो संन्यासी (तु) पुनः (आत्मन्नेव) आत्मा में, अर्थात् परमेश्वर ही में तथा अपने आत्मा के तुल्य (सर्वाणि भूतानि) सम्पूर्ण जीव और जगत्स्थ पदार्थों को (अनुपश्यति) अनुकूलता से देखता है, (च) और (सर्वभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणी- अप्राणियों में (आत्मानम्) परमात्मा को देखता है, (ततः) इस कारण वह किसी व्यवहार में (न विचिकित्सति) संशय को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् परमेश्वर को सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वसाक्षी जानके अपने आत्मा के तुल्य सब प्राणिमात्र को हानि- लाभ सुख-दुःखादि व्यवस्था में देखे, वही उत्तम संन्यासधर्म को प्राप्त होता है॥३॥ (विजानतः) विज्ञानयुक्त संन्यासी का (यस्मिन्) जिस पक्षपातरहित धर्मयुक्त संन्यास में (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणिमात्र को (आत्मैव) आत्मा ही के तुल्य जानना, अर्थात् जैसा अपना आत्मा अपने को प्रिय है, उसी प्रकार का निश्चय (अभूत्) होता है, (तत्र) उस संन्यासाश्रम में (एकत्वमनुपश्यतः) आत्मा के एकभाव को देखनेवाले संन्यासी को (कः मोहः) कौन- सा मोह और (कः शोकः) कौन-सा शोक होता है? अर्थात् न उसको किसी से कभी मोह और न शोक होता है। इसलिए संन्यासी मोह-शोकादि दोषों से रहित होकर सदा सबका उपकार करता रहे॥४॥ इस प्रकार परमात्मा की स्तुति प्रार्थना और धर्म में दृढ़ निष्ठा करके जो (भूतानि) सम्पूर्ण पृथिव्यादि भूतों में (परीत्य)