संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसामान्यप्रकरणम् ३३ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय—इदं न मम ॥ इन दोनों मन्त्रों से वेदी के मध्य में दो आहुति देनी। उसके पश्चात् चार आहुति अर्थात् आधारावाज्यभागाहुति देके, जब प्रधानहोम अर्थात् जिस-जिस कर्म में जितना-जितना होम करना हो करके, पश्चात् भी पूर्णाहुति से पूर्व पूर्वोक्त चार (आधारावाज्यभागा०) देवें। पुनः शुद्ध किये हुए उसी घृत में से स्रुवा को भरके प्रज्वलित समिधाओं पर व्याहृति की चार आहुति देवें— ओं भूरग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदं न मम ॥ ओं भुवर्वायवे स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदं न मम ॥ ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय—इदं न मम ॥ ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः स्वाहा ॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः—इदं न मम ॥ ये चार घी की आहुति देकर, स्विष्टकृत् होमाहुति एक ही है, यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिए। उसका मन्त्र— ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा ॥ इदमग्नये स्विष्टकृते—इदं न मम ॥ इससे एक आहुति करके, प्राजापत्याहुति करें। यह नीचे लिखे मन्त्र को मन में बोलके देनी चाहिए— ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ इससे मौन करके एक आहुति देकर चार आज्याहुति घृत की देवें, परन्तु ये नीचे लिखी आहुति चौल, समावर्त्तन और विवाह में मुख्य हैं, वे चार मन्त्र ये हैं—