संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगर्भाधानप्रकरणम् ५१ सत्कारपूर्वक सबको विदा करें। इसके पश्चात् रात्रि में नियत समय पर जब दोनों का शरीर आरोग्य, अत्यन्त प्रसन्न और दोनों में अत्यन्त प्रेम बढ़ा हो, उस समय गर्भाधान-क्रिया करनी। गर्भाधान-क्रिया का समय प्रहर रात्रि के गये पश्चात् प्रहर रात्रि रहे तक है। जब वीर्य गर्भाशय में जाने का समय आवे तब दोनों स्थिरशरीर, प्रसन्नवन्दन, मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिकादि सब सूधा शरीर रक्खें। वीर्य का प्रक्षेप पुरुष करे। जब वीर्य स्त्री के शरीर में प्राप्त हो, उस समय अपना पायु, मूलेन्द्रिय और योनीन्द्रिय को ऊपर संकोच और वीर्य को खैंचकर स्त्री गर्भाशय में स्थिर करे। तत्पश्चात् थोड़ा ठहरके स्नान करे। यदि शीतकाल हो तो प्रथम केसर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, छोटी
दो खण्ड आँबाहल्दी, दूसरी खाने की हल्दी, चन्दन, मुरा (यह नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है) कुष्ठ, जटामांसी, मोरवेल (यह भी नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है), शिलाजीत, कपूर, मुस्ता, भद्रमोथ। इन सब ओषधियों का चूर्ण करके, सब समभाग लेके, उदुम्बर के काष्ठपात्र में गाय के दूध के साथ मिला उनका दही जमा और उदुम्बर ही की लकड़ी की मन्थनी से मन्थन करके उसमें से मक्खन निकाल उसको ताय, घृत करके, उसमें सुगन्धित द्रव्य केशर, कस्तूरी, जायफल, इलायची, जावित्री मिलाके अर्थात् सेर- भर दूध में छटांकभर पूर्वोक्त सर्वोषधि मिला, सिद्धकर, घी हुए पश्चात् एक सेर में एक रत्ती कस्तूरी और एक मासा केशर और एक-एक मासा जायफलादि भी मिलाके, नित्य प्रातःकाल उस घी में से नित्य होम ३२ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति ४ चार और पृष्ठ ४१ में लिखे हुए (विष्णुर्योनिं०) इत्यादि ७ सात मन्त्रों के अन्त में स्वाहा शब्द का उच्चारण करके जिस रात्रि में गर्भस्थापन क्रिया करनी हो उसके दिन में होम करके उसी घी को दोनों जने खीर अथवा भात के साथ मिलाके यथारुचि भोजन करें।