भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

अथ जातकर्म-संस्कारविधिः इसका समय, प्रमाण और कर्मविधि इस प्रकार करें। सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति ॥ इत्यादि पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है। इसी प्रकार आश्वलायन, गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी लिखा है। जब प्रसव होने का समय आवे, तब निम्नलिखित मन्त्र से गर्भिणी स्त्री के शरीर पर जल से मार्जन करे— ओम् एज॑तु दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह। यथा॒यं वा॒युरेर्जति॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वायं दश॑मास्यो॒ अस्रं॑ज्जरायु॑णा स॒ह॥ १ ॥ —यजुः० अ० ८। मं० २८॥ इससे मार्जन करने के पश्चात्— ओम् अवैतु पृश्निशेवलः शुने जरावत्तवे। नैव मांसेन पीवरीं न कस्मिंश्चनायतनमव जरायु पद्य॒ताम्॥ इस मन्त्र का जप करके पुनः मार्जन करे। कुमारं जातं पुराऽन्यैरालम्भात् सर्पिर्मधुनी हिरण्यनिकाषं हिरण्येन प्राशयेत् ॥ जब पुत्र का जन्म होवे तब प्रथम दायी आदि स्त्री लोग बालक के शरीर का जरायु पृथक् कर मुख, नासिका, कान,