संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ ओ३म् ॥ भूमिका सब सज्जन लोगों को विदित होवे कि मैंने बहुत सज्जनों के अनुरोध करने से श्रीयुत महाराजे विक्रमादित्य के संवत् १९३२ कार्त्तिक कृष्णपक्ष ३० शनिवार के दिन 'संस्कारविधि' का प्रथमारम्भ किया था। उसमें संस्कृतपाठ सब एकत्र और भाषापाठ एकत्र लिखा था। इस कारण संस्कार करानेवाले मनुष्यों को संस्कृत और भाषा दूर-दूर होने से कठिनता पड़ती थी और जो एक हज़ार पुस्तक छपे थे, उनमें से अब एक भी नहीं रहा। इसलिए श्रीयुत महाराजे विक्रमादित्य के संवत् १९४० आषाढ़ बदि १३ रविवार के दिन पुनः संशोधन करके छपवाने के लिए विचार किया। अब की बार जिस-जिस संस्कार का उपदेशार्थ प्रमाण- वचन और प्रयोजन है, वह-वह संस्कार के पूर्व लिखा जाएगा। तत्पश्चात् जो-जो संस्कार में कर्त्तव्य विधि है, उस-उसको क्रम से लिखकर पुनः उस संस्कार का शेष विषय जोकि दूसरे संस्कार तक करना चाहिए, वह लिखा है और जो विषय प्रथम अधिक लिखा था, उसमें से अत्यन्त उपयोगी न जानकर छोड़ भी दिया है और अब की बार जो-जो अत्यन्त उपयोगी विषय है, वह- वह अधिक भी लिखा है। इसमें यह न समझा जावे कि प्रथम विषय युक्त न था, और युक्त छूट गया था उसका संशोधन किया है, किन्तु उन विषयों का यथावत् क्रमबद्ध संस्कृत के सूत्रों में प्रथम लेख किया था। उसमें सब लोगों की बुद्धि कृतकारी नहीं होती थी,