भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

जातकर्मप्रकरणम् ६७ इन प्रत्येक मन्त्र से छह बार घृत-मधु प्राशन कराके तत्पश्चात् चावल और जव को शुद्ध कर पानी से पीस, वस्त्र से छान, एक पात्र में रखके हाथ के अंगूठा और अनामिका से थोड़ा-सा लेके— ओम् इदमाज्यमिदमन्नमिदमायुरिदममृतम् ॥ इस मन्त्र को बोलके बालक के मुख में एक बिन्दु छोड़ देवे। यह एक गोभिलीयगृह्यसूत्र का मत है, सबका नहीं। पश्चात् बालक का पिता बालक के दक्षिण कान में मुख लगाके निम्नलिखित मन्त्र बोले— ओं मेधां ते देवः सविता मेधां देवी सरस्वती। मेधां ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥१॥ ओम् अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्माँस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥२॥ ओं सोम आयुष्मान्स ओषधीभिरायुष्माँस्तेन०* ॥३॥ ओं ब्रह्माऽऽयुष्मत् तद् ब्राह्मणैरायुष्मत् तेन० ॥४॥ ओं देवा आयुष्मान्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन० ॥५॥ ओम् ऋषय आयुष्मान्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेन० ॥६॥ ओं पितर आयुष्मान्तस्ते स्वधाभिरायुष्मन्तस्तेन० ॥७॥ ओं यज्ञ आयुष्मान्स दक्षिणाभिरायुष्माँस्तेन० ॥८॥ ओं समुद्र आयुष्मान्स स्त्रवन्तीभिरायुष्माँस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥९॥

  • यहाँ पूर्व मन्त्र का शेष भाग (त्वा) इत्यादि उत्तर मन्त्रों के पश्चात् बोले।