भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

योतिरोग ।

८७

  1. १. सूर्य चुभोनेके समान पीड़ा होती है ।
  2. २. घाव जल्दी बढ़ता है ।
  3. ३. घाव उभरा नहीं होता, बराबर रहता है ।
  4. ४. निर्बलता बढ़ जाती है और शरीर दुर्बल होता चला जाता है ।

५. रक्ता बहाव बराबर जारी रहता है । यह एक बड़ा कठिन रोग है । रक्तमें बड़ी बढ़त आती है । पेशा जल्म बढ़ा और दो तरहसे होता है । पहले एक दाना पड़ता है और वह फूटकर फैलने लगता है । दूसरा इस तरह होता है कि एक गाँठ सरीखी पड़कर पक जाती है और बाव फैलता चला जाता है । प्रायः काले रंगकी अग्नेड खियोंमें, जिनकी अवस्था ४० वर्षसे कुछ कमवेश हो, यह रोग अधिक होता है ।

६. योनिभ्रंश ।

इसके कई कारण हैं ।

(१० क्र०) ।

  1. १. गर्भाशयके आगे दल जानेसे ।
  2. २. कूदने, दौड़ने और ऊँचे नीचे चढ़नेसे ।
  3. ३. मुख या पीठके बल गिर पड़नेसे ।
  4. ४. गर्भाशयके दल जानेके अनेक कारणोंसे । (इस विषयमें पहले लिख चुके हैं ।)

इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।

  1. १. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट ।
  2. २. लसदार पतला पदार्थ योनिसे गिरना ।
  3. ३. पेशाब, पाखानेमें कष्ट होता है ।
  4. ४. आगे वजन मालूम होता है ।
  5. ५. पैड़में मरोडके समान दर्द होता है ।