संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोनिरोग ।
८९
३. रक्तके दूषित हो जानेसे ।
४. योनिमें दांतोंके पड़ जानेसे ।
५. योनिकी गन्धगी और उपर्दशके विकारसे ।
६. ऋतुधर्मके विगाड़से ।
७. प्रेन्दर और मूत्राशयके शोथसे ।
८. योनिके भीतर और योनि-मुखके शोथसे ।
९. योनिके मुखसे छोटे छोटे कीड़ोंके पैदा हो जानेसे ।
१०. योनिकी गन्धगीसे जब कि अन्दर सफाई न की जावे ।
११. अन्दर मैल और पसीनेके जम जानेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. पहले खाज कम होती है । ज्यों ज्यों खुजलाया जाता है, जलन अधिक होती है ।
२. खाजकी जलन सहन नहीं होती ।
३. योनिका रस्ता कुछ सकरा पड़ जाता है ।
४. रोग बढ़नेपर बढ़ बढ़ता आती है ।
पेसी खुजली कफके विगाड़से होती है । यह योनिके अन्दर हर जगह पर हो सकती है । जरा जरासे ढोढ़े भी पड़ जाते हैं ।
६. योनिकी फुंसियाँ ।
इसके कई कारण हैं । ( १० को )
१. रज विकार और छूतका बाहर या भीतरसे पहुँचना ।
२. योनिकी गन्धगी और रक्त निकलनेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. जलन, दर्द कुछ सज़नका होना और मैथुनन हो सकता ।
२. ज्वर और खाजका आना, उठने बैठनेमें कष्ट ।
यह रोग योनिके हर स्थानपर हो सकता है । रोग बढ़नेपर योनिके छूनमें भी अधिक पीड़ा होती है ।