संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रदर रोग ।
६७
३. अतिमैथुन और गर्भाशयमें सर्दी पहुंचनेसे ।
४. उपदंशके अनेक विकारोंसे ।
५. पांडुरोग, दूषित आहार और रजके बिगाड़से ।
६. कुपच और शरीरका निर्बल हो जाना ।
७. अतिमैथुनसे योनिमें घाव होने और पक जानेसे ।
८. गर्भाशयके रोग झाले, मस्से, शोथ, टल जाने, मोटे पड़ जाने और दग्ध हो जानेसे ।
९. योनिमें झाले, दाने और जख्म हो जानेसे ।
१०. जहरीले ज्वर और क्षय इत्यादिसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१ ज्वर, सर, कमर और नेत्रोंमें पीड़ा, अपच, हृदय, पसली, पीठ, नितम्बोंमें कठिक दर्द, प्यासका लगना साँसका उखड़ जाना, खाँसी कैंपकैंपी इत्यादि ।
यह बड़ा विलक्षण रोग है । इसमें प्रायः ऋतुवर्षके बाद दो तीन दिन तक सफेद खाव हुआ करता है । परन्तु चे स्त्रियाँ कि जो विशेष कारणोंसे इस रोगमें फँसती हैं, उनको नित्य होता है । बड़े हुए रोगमें ऐसे खावके साथ लाली अवश्य आती है । जब योनिसे सफेद खाव हो तो वह दूधमें मिले हुए पनीके समान पतला और सफेद होता है और जब ऐसा खाव गर्भाशयसे आता है तो चिकना और गढ़ा होता है, परन्तु इसमें कुछ वस्तु अवश्य आती है । जब गर्भ न रहे और चिकना खाव हुआ करे, तो गर्भाशयका शोथ इत्यादि जानना चाहिये । पतले सफेद खावमें योनिशोथ इत्यादि समझना चाहिये । जब इस दशामे झाले, घाव इत्यादि होजाते हैं तब लाली आती है या जब कर्मां ऐसी दशामें योनि और गर्भाशय की नष्ट इत्यादि किसी दवावके कारण फट जाती है-तो रक्तसे
७