संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
३. वैद्यकका मत ।
१. गर्भाधान समयमें वीर्य अधिक होनेसे पुत्र और रज अधिक होनेसे कन्या, दोनों बराबर होनेसे नपुंसक सन्तान होती है। (सु० श० अ० ६ श्लो० ४)
(भोज वैद्य और चरकने भी ऐसा ही कहा है।)
२. रजस्वला होनेसे ६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रातमें गर्भाधान होनेसे पुत्र और ५-७-९-११-१३ और १५ वीं रातमें कन्या उत्पन्न होती है। (सु० श० अ० ६ श्लो० ११)
(विदेहाचार्य भोज वैद्य और भावमिश्र भी ऐसा ही कहा है।)
३. पुरुषके दाहिने अङ्गसे पुत्र और बाएँसे कन्या, इसी भाँति स्त्रीके दाहिने अङ्गसे पुत्र और बाएँसे कन्या उत्पन्न होती हैं। (श० क०)
४. स्त्रीके काममन्दिरवाले मुखमें तीन नाड़ी होती हैं। गर्भाधान समय में इनमें वीर्य गिरने से गर्भ रहता है। इनका च्यौरा इस प्रकार है। (भा० न० प्र० ६ श्लो० १७ से २०)
(१) ममीरुषा—इस नाड़ीमें वीर्य गिरने से गर्भ नहीं रहता।
(२) चन्द्रमसी—इसका मुख थोड़े ही संयोगसे खुल जाता है। इसमें वीर्य गिरने से कन्या होती है।
(३) गौरी—इसका मुख खूब अन्दो तरह कामोद्दीपन होनेसे खुलता है। इसमें वीर्य गिरनेसे पुत्र उत्पन्न होता है।
४. हिन्दुओंका प्राचीन मत ।
१. एक बार महापानी लीलावतीने महाराज भोजसे कहा