संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
१५६
प्रयत्न करता है । जब दोनों के चित्तपर प्रेम अपना अधिकार इस प्रकार जमा लेता है तभी स्त्री पुरुष रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ होते हैं । प्रेमका कैसा महत्व है कि यदि स्त्री पुरुष के परस्पर प्रेमसे गर्भाधान हो तो सन्तान हर प्रकार से सुन्दर, गुणवान, सुशील निद्रोग और बुद्धिमान उत्पन्न होती है । कारण यह है कि गर्भाधानके समय रजवीर्य पर प्रेमका प्रभाव पड़ता है और यही प्रेम रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करने का कारण है । प्रेमही से माता-पिता के गुण वच्चोंमें आते हैं । प्रेम ही प्रत्येक गुणों को उत्तेजितकर संजीवनी शक्ति उत्पन्न करता है । प्रेमही से वच्चोंमें मानसिक और शारीरिक शक्तियोंका विकास उत्तमतासे होता है इतना ही नहीं प्रेम वच्चे के शरीर को भी बढ़ाता है जिस प्रकार माता और गर्भका संवन्ध है इसी प्रकार प्रेम और गुणका संवन्ध है । अतएव जहाँ माता पिता प्रेमी होते हैं वहीं सर्व-गुण-संपन्न सन्तान उत्पन्न होती हैं । जहाँ स्त्री पतिसे प्रेम करती है और पति स्त्रीसे प्रेम नहीं करता या पति स्त्रीसे प्रेम करता है और स्त्री पतिसे प्रेम नहीं करती, वहाँका तो कहना ही क्या है । काली, कुवडी और कुरुप अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । जहाँ पुरुषकी ओरसे प्रेम होता है तो बच्चे के चेही अंग सुडौल होते हैं कि जो पिताके वीर्यसे बनते हैं । जहाँ स्त्रीकी ओरसे प्रेम होता है वहाँ चेही अंग सुडौल होंगे कि जो स्त्रीके रजसे बनेंगे । अतएव सारे अङ्गोंको सुन्दर, सुडौल बनानेके लिये माता-पिता दोनोंके ओरसे प्रेम होना आवश्यक हैं । जितनी जातियाँ हैं, सबमें स्त्री और पुरुषके प्रेमको प्रधान माना है । हिन्दू जातिमें विवाह जन्मपत्री मिलाकर होता है, प्रहर्मेत्री और गणमेत्री आदि देख जाते हैं । इस कारण कि इनमें आगे