संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 302 में से
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सन्ततिशास्त्र ।
(३४) गर्भकी वायुका सन्तानपर प्रभाव ।
गर्भाशय वन्धनेके रहने का स्थान है । जब यहाँ पर किसी प्रकारसे वायुका उत्पात हो जाता है, तब अनेक प्रकारकी रोगी सन्तान उत्पन्न होती है । इसके अनेक भेद हैं ।
१. गर्भाधान होनेपर गर्भमें वायुसे मिले हुए रज वीर्यके दो भाग हो जानेसे इसके एक भागमें वीर्य और दूसरे भागमें रज अधिक हो, तो एक कन्या और एक पुत्र उत्पन्न होता है । रज-वीर्य मिले पदार्थमें जब अधिक वीर्य हो तो उसके दो भाग हो जाने से दो पुत्र और जब रज अधिक हो तो दो भाग हो जानेसे दो कन्याएँ उत्पन्न होती हैं । जब वही हुई वायुसे मिले हुए रजवीर्यके कई टुकड़े हो जावें, तो कर्मवश एक ही बार बहुत सी सन्तानें उत्पन्न होती हैं ।
(च० श० अ० २ शी० ११ सं १३ )
२. वायु द्वारा मिले हुए रज-वीर्यके दो भाग हो जानेपर बड़े भागसे जो बालक होगा वह पुष्ट और छोटे टुकड़ोंसे निर्बल और क्षीण देहवाली सन्तान होगी ।
(च० श० अ० २ श्लो० १५ )
३. यदि वायु गर्भके शुक्राशयको चिगाड़ दे, तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको पवनेन्द्री नपुंसक कहते हैं ।
(च० श० अ० २ श्लो० १७ )
४. यदि वायु शुक्राशयके द्वारको रोक दे तो सस्कारवाही नपुंसक पैदा होता है ।
(च० श० अ० २ श्ली० १८ )
५. वायु और अग्निके दोषसे जिसके दोनों अण्डकोष नष्ट