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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

७. यदि स्त्री लिंगके समान किसी वस्तु, गाजर मूली इत्यादिसे मैथुन करावे, तो पिंड सरीखा सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

८. यदि स्त्री रजो-धर्मसे स्नान कर कामवश पुरुषसे स्वप्नमें मैथुन करावे तो वायुसे चिगड़ कर रज कुक्षिमें गर्भ सा बन जाता है और पिताके वीर्य गुणोंसे रहित बिना हडिडियोंका एक पिंड सरीखा उत्पन्न होता है ।

( सु० श० अ० २ ख० ५२ व ५३ )

इस प्रकार मातापिताके दपित व्यवहारोंसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव मातापिताको अत्यन्त सावधानीसे रहना चाहिये ।

(३७) सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव ।

रज वह पदार्थ है कि जिससे शरीर चलता है । यह जितना उत्तम होता है उतनी ही अच्छी सन्तान होती है । जब किसी प्रकारसे रज दूषित हो जाता है, तो अनेक रोगयुक्त सन्तान उत्पन्न होता है । इसके अनेक भेद हैं ।

१. जब रज और गर्भोत्पादक यौग दूषित हो जाते हैं, तब वन्ध्या-दोषयुक्त कन्या उत्पन्न होती है । ( श० क० )

२ जब रजमें गर्भोत्पादक भाग दूषित हो जाता है, तब सड़ी हुई सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

३. जब रजमें गर्भकारक पुरुष-यौग-भाग दूषित हो जाता है तब स्त्रीकी आकृतिवाली किन्तु स्त्री बिनहोसे रहित, वातां नामक सन्तान होती है । ( श० क० )

४. रजसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं जब उन अवयवोंका अंश, जिससे वे अवयव बनते हैं, दूषित हो

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