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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव ।

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६. पित्त और कफ से दूषित वीर्यकी उत्पन्न सन्तान अल्पायु, टेढ़े अंगवाली होती है । (१० क०)

१०. वात, पित्त और कफ तीनोंसे दूषित वीर्य सन्तान उत्पन्न नहीं करता । गर्भपात हो जाता है । (१० क०)

११. सिद्धियोंका कुरूप और काला रंग, यूरोपियनोंकी कंजी आखें, अमेरिकावालोंका ताम्रवर्ण, काबुलियोंका कोधी होना, वीर्यका दोष है ।

१२. गर्भाधान समयमें यदि पिताका बहुत ही थोड़ा वीर्य हो तो आसेवय अर्थात् थोड़े वीर्यवाला पुरुष उत्पन्न होता है । (सु० १० अ० २ श्लो० ४२)

१३. वीर्य-दोषके कारण गर्भमें कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जाता है । पैंसी खीके स्तन नहीं निकलते और न उसे पुरुष समागमकी इच्छा होती है । पैंसी खीको पत्नी कहते हैं । (च० चि० अ० ३० श्लो० २३)

१४. जब पुरुष के बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है, तब पित्त अर्थात् पितासे उत्पन्न होनेवाले अवयवोंमें विकार होता है । (१० क०)

१५. जब पुरुषके सन्तान-कारक अर्थात् सन्तान उत्पन्न करनेवाले बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है तो पूति अर्थात् नमर्द सन्तान उत्पन्न होती है । (१० क०)

१६. जब पुरुष-कारक बीजभाग दूषित हो जाता है, तब पुरुषकृति, विशिष्ट पुरुष चिह्नोंसे रहित, दण्डपूति सन्तान होती है । (१० क०)

१७. वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं, जब वीर्यमें उन अवयवोंका अंश, जिससे वे बनते हैं, दूषित हो

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