भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

३ पेट के बीचका भाग ऊँचा होनेसे । ( वा० श० अ० १ )

६. जोड़ली—जोड़ुर्घा सन्तानके लक्षण ।

१. पेट दोनों तरफसे उभरा और बीचमें नीचा होनेसे दो सन्तान होती हैं । ( सु० श० ग्र० ३ श्लो० ५० )

२. एक ओर श्रथात् दहिनी ओर पेटका उभार और बाई ओर जरा नीचे होनेमें। एक कन्या एक पुत्र होता है । ( श० क० )

३. दोनों ओर बराबरके उभारसे यदि अधिक उभार हो, तो दोनों पुत्र, यदि उभार नीचा हो, तो दो कन्याएँ होती हैं । ( श० क० )

४ दोसे अधिक सन्तान होनेवालीके लक्षण ।

१ जो लक्षण दो बच्चे होनेवालीके होते हैं वेही कई बच्चे होनेवालीके भी होने हैं । ( श० क० )

इस प्रकार गर्भके बालककी परीक्षा हों सकती हैं ।

(४४) मूढ़गर्भ ।

गर्भकी उत्पत्तिका स्थान गर्भाशय है । यह एक ऐसी पवित्र भूमि है कि जहाँसे बच्चा नौ मास निवास करके बाहर होता है । गर्भ दो प्रकारका होता है। सच्चा और भूटा । सच्चा गर्भ वह है कि जिससे बच्चा उत्पन्न होता है । भूटा गर्भ वह है कि जिसमें बच्चा नहीं रहता, केवल मांसपिंड होता है। ऐसे गर्भको ( False Pregnancy ) कहते हैं ।

जब किसीको भूटा गर्भ होता है, तो स्त्रियाँ उसे सच्चा गर्भ समझ लेती हैं । ऐसा इस कारण होता है । कि जितने लक्षण सच्चे गर्भमें होते हैं वे ही भूटे गर्भमें भी होते हैं । जैसे रजो-धर्मका बन्द हो जाना, जी मचलाना, कै होना, भोजनमें श्रद्धा,