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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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गर्भवतीके कर्तव्य ।

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क्रे और जी मचलाना बन्द करके भूख बढ़ाती है। ऐसे समयमें बच्चेका हृदय तैयार हो जाता है, इसलिये माताको अपने हृदय और बच्चे दोनोंके हृदयका पालन करना पड़ता है। यही समय बालकके शरीर बढ़नेका भी होता है। अतएव माता जितना श्रद्धा और अधिक भोजन करती है, उतना ही उत्तम और अधिक रस बनकर बच्चेकी बाढ़में सहायता पहुँचता है और उसका पोषण करता है।

गरिष्ठ, कड़ा, खड़ा, कसैला और फीका भोजन न होना चाहिये। चरबी बढ़नेवाले पदार्थ जैसे घी और मिठाई इत्यादि अधिक न खाना चाहिये। चरबी बढ़नेसे शरीर मोटा पड़ जाता है। इससे सबसे बड़ी हानि यह होती है कि पैदा होते समयमें बच्चा फँस जाता है। प्रायः इसी कारण अनेक बार बच्चोंकी मृत्यु भी देखी गई है।

गर्भवतीको यह सलाह कभी न देनी चाहिये कि वह मांस खावे या शराब पीवे। इससे दुष्ट प्रकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। प्रत्येक मातापिताको अमूल्य रत्न उत्पन्न करनेकी लालसा रखनी चाहिये।

प्राज्ञ कलके पहनावेकी दशा भी विचार करने योग्य है। स्त्रियाँ सभ्य ललनार्प बननेके लिये सुस्त और बदनसे जकड़ा हुआ कल पहनती हैं। यदि गर्भ-समयको छोड़कर और समयोंमें पहना जाय, तो इतना हर्ज नहीं है, परन्तु गर्भावस्थामें इससे बड़ी हानि होती है। पेट भिचने और काखोंके दबनेसे बड़ा कष्ट होता है, बच्चेकी बाढ़ रुक जाती है तथा स्थानसे दल जानेका भय रहता है।

जिन स्त्रियोंका पेट बड़ा होता है उनका गर्भ नीचेको लटक आता है और बच्चेको महान् कष्ट होता है। इसलिये एक