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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

चता है । बार बार थक्का लगनेसे गर्भाशय ढीला पड़ जाता है और गर्भपात हो जानेका भय रहता है ।

६. कृच्छ्र । इसको लोग मामूली रोग समझते हैं, परन्तु यह एक बड़ा भयंकर रोग है । आंतोंपर दवाव पड़नेसे यह हो जाता है । इससे गर्भको बहुत बड़ा हानि पहुँचती है क्योंकि शौच जाते समय कान्धनेसे गर्भपर दवाव पड़ता, जिसका सहन करना पूरे दिनोंकी गर्भवतीका कठिन होता है । जब पेशा हो, तो जल्दी पचनेवाला हलका भोजन करना चाहिये ।

७. रक्तका कम बनना । यह रोग उन स्त्रियोंको विशेष होता है कि जो अत्यन्त दुबली और सूखी होती हैं जिनके शरीरमें रक्त पहले हीसे कम होता है और गर्भ स्थित होनेपर कम बनता भी है । कारण यह है कि भोजन किये हुए पदार्थोंसे रस बनता है और रससे रक्त । जबकि भोजन ही कम किया जाता है और चने हुए रससे चञ्चेका भी पोषण होता है, तो यदि पेशे समयमें कुपच या अतिसार पेशी बीमारी हो गई तो रक्त कम बनने लगता है और गर्भवती अत्यन्त निर्बल हो जाती है । अतएव बच्चा उत्पन्न होते समयमें कठिनाई पड़ती है ।

८. मूत्ररोग । यह उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका गर्भाशय टल जाता है । इसके कई कारण हैं ।

१. बार बार मूत्रका आना—पेशा दो तरहसे होता है । यदि यह रोग गर्भके प्रारम्भके दिनोंमें हो, तो मूत्राशयकी गरदनकी खाड़से और जब अन्तके दिनोंमें हो, तो मसानेपर गर्भाशयके दवाव पड़नेसे होता है । जब पेशा होता है तो गर्भाशयमें सूत्र रहने ही नहीं पाता ।

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