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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तर्ता-शारङ्ग ।

दिमाग, आलसी और दिन रात आराम करनेवाली स्त्रियोंको विशेष होता है। गर्भसाव या गर्भपातमें सबसे पहले रक्त निकलता है। जब कि दो तीन मासका गर्भ होता है तो स्त्रियों को रजस्वला होनेका धोखा हो जाता है। ऐसी दशामें जब पीड़ा हो तो तुरन्त गर्भसाव और गर्भपातका प्रकोप समझना चाहिये। रक्तसाव होनेके साथ ही गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। प्रायः दो दो तीन तीन दिन तक जारी रहकर हानि होती है। किसी किसी स्त्रीके रक्तसाव होकर रह जाता है, गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। जब अत्यन्त पीड़ा हो तो गर्भसाव या गर्भपात का समय समझना चाहिये।

कभी कभी ऐसे समयमें दशा जडी भयंकर हो जाती है और स्त्रीको सदाके लिये संसार छोड़ देना पड़ता है।

(५०) मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ?

यह एक बड़ा सवाल है कि शरीरमें क्या क्या माता पिताके किस किस अंश से उत्पन्न होता है ? या तो शरीरकी उत्पत्ति मातापिताके अंशसे ही होती है, परन्तु वैद्योंने गर्भको मातृज, पितृज, आत्मज, स्वात्मज और रसज माना है। इनके ही अंश से सब कुछ बनकर शरीर तैयार होता है।

१. वैद्यकका मत ।

१. माताके भ्रंशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ मातृज होता है, क्योंकि विना माताके गर्भ रह ही नहीं सकता। शरीरमें मातासे उत्पन्न होनेवाली वस्तुयें ये हैं—चमड़ा, रक्त, मांस, मेदा, नाभि, हृदय मूत्रा-शय क्रोम (प्यास लगनेकी जगह) तिह्री, पिलही,