संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
(५६) बच्चेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।
ईश्वर की माया बड़ी बलवान् है। बच्चा नौ महीने गर्भ में रहकर पके फलके समान प्रकट होता है। माताको क्लेश होता यह ता प्रकृतिका नियम है। निर्वल और छोटी स्त्रियाँ तो प्रायः कुछ अधिक कष्ट पाती हैं, परन्तु जो लम्बी और बलवती हैं उन्हें कम कष्ट होता है। मोटी स्त्रियाँमें बच्चेको कष्ट अधिक होता है यह एक नाजुक समय है। इसमें बहुत बड़ी सावधानी चाहिये। बच्चा पैदा होने के आठ दस दिन पहलेसे ही स्त्रीको ऐसे उत्तम और हवादार मकानमें रखना चाहिये कि जिसका दरवाजा पूर्व और दक्षिणकी ओर हो, जिसकी लम्बाई १८ चौड़ाई १२ और ऊँचाई ८ फुट से कम न हो। ऐसे घरमें खिडकियाँ अवश्य होनी चाहियें। जहाँ बच्चा पैदा हो वहाँ धूआँ करना बहुत बुरा है, इससे प्रसूताके स्वास्थ्यपर बहुत बड़ा धक्का पहुँचता है। ऐसे मकानके आस-पास कूड़ा-कचरा न होना चाहिये और ऐसी चीजें भी न हों कि जिसमें जीव पाप जावें। पासमें पाखाना और नावदान होना बुरा है। वरकी पोताई चुनेसे होनी चाहिये। जहाँतक हो सके ऐसा प्रबन्ध हो कि जिसमें सील इत्यादिके कीड़े वहा न जा सकें। मिट्टीका तेल जलाना बहुत नुकसान करता है। आन्ध्रव्योके वक्तोंपर ध्यान न देकर लोग नर्कमें बच्चा जनाना लाभदायक समझते हैं। यदि इसपर भी बच्चों और माताओंकी मृत्यु-संख्या न बढे तो क्या हो क्या हो? जहा कूड़ा-करकट भरा हुआ है, मच्छर भिनभिना रहे हैं, मखिया उड रही हैं, सीलके कीड़े दौड रहे हैं, वायु जाती ही नहीं, अँधेरा छा रहा है, जहाँ चार छ